उत्तर:
- भक्ति आंदोलन की शुरुआत 6वीं-7वीं शताब्दी में दक्षिण भारत से हुई और धीरे-धीरे यह पूरे भारत में फैल गया। इसका मूल उद्देश्य धार्मिक जटिलताओं को दूर कर ईश्वर के प्रति प्रेम जगाना और समाज के सभी वर्गों में एकता व समरसता स्थापित करना था। इसने भारतीय समाज पर निम्नलिखित गहरे प्रभाव छोड़े:
सामाजिक प्रभाव:
- जाति प्रथा व छुआछूत का विरोध: संतों ने जन्म आधारित श्रेष्ठता को सिरे से नकारा। उदाहरण: गुरु नानक देव जी द्वारा 'लंगर' व्यवस्था की शुरुआत, जहाँ सभी जातियों के लोग एक पंगत में बैठकर भोजन करते थे।
- कर्मकांडों व रूढ़ियों पर प्रहार: पुजारियों के एकाधिकार और बाह्य आडंबरों को चुनौती दी गई। उदाहरण: संत रविदास और कबीर जैसे संतों ने आंतरिक पवित्रता और कर्म (श्रम) की महत्ता पर बल दिया।
- महिला सशक्तिकरण: महिलाओं को घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर आध्यात्मिक अधिकार प्राप्त हुए। उदाहरण: दक्षिण में आंडाल तथा उत्तर में मीराबाई और कश्मीर की ललद्यद (लाल देद) जैसी संतों ने पितृसत्ता को चुनौती दी।
- सांप्रदायिक सौहार्द: हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच कटुता कम हुई। उदाहरण: कबीर और दादू दयाल ने दोनों धर्मों की कुरीतियों की आलोचना कर एक साझा अनुयायी वर्ग तैयार किया।
- मानवतावाद का उदय: मानव सेवा को ही सर्वोपरि माना गया, जिससे समाज में वंचित वर्गों के प्रति सहानुभूति बढ़ी।
सांस्कृतिक प्रभाव:
- क्षेत्रीय भाषाओं और साहित्य का विकास: उपदेशों के लिए संस्कृत की जगह आम जन की भाषाओं (अवधी, ब्रज, मराठी, असमिया) का प्रयोग हुआ। उदाहरण: अवधी में तुलसीदास कृत 'रामचरितमानस' और मराठी में तुकाराम के 'अभंग' की रचना। गुरु अंगद देव ने 'गुरुमुखी' लिपि का मानकीकरण किया।
- संगीत और कला का संवर्धन: ईश्वर से जुड़ने के लिए संगीत व नृत्य को माध्यम बनाया गया। उदाहरण: बंगाल में चैतन्य महाप्रभु द्वारा 'संकीर्तन' (हरे कृष्ण) परंपरा और असम में शंकरदेव द्वारा 'सत्त्रिया' नृत्य का विकास।
- दार्शनिक समृद्धि: सगुण और निर्गुण विचारधाराओं के साथ नए दर्शनों का उदय हुआ। उदाहरण: आदि शंकराचार्य का 'अद्वैतवाद', रामानुजाचार्य का 'विशिष्टाद्वैतवाद' तथा वल्लभाचार्य का 'पुष्टिमार्ग'।
- नई संस्थाओं की स्थापना: समाज को जोड़ने के लिए नए धार्मिक केंद्रों का निर्माण हुआ। उदाहरण: असम में शंकरदेव द्वारा 'नामघर' (प्रार्थना घर) की स्थापना।
- समन्वयवादी संस्कृति का जन्म: भक्ति और सूफी संतों के परस्पर वैचारिक आदान-प्रदान से कला और साहित्य में गंगा-जमुनी तहजीब (मिश्रित संस्कृति) का विकास हुआ।
निष्कर्षतः
- भक्ति आंदोलन ने मध्यकालीन रूढ़ियों की बेड़ियों को तोड़कर एक समावेशी, सहिष्णु और समतामूलक समाज की नींव रखी। साथ ही, इसने क्षेत्रीय साहित्य और कलाओं को पल्लवित कर भारतीय सांस्कृतिक विरासत को अद्वितीय विस्तार और गहराई प्रदान की।