उत्तर:
- ओजोन परत में ओजोन O3 ऑक्सीजन के 3 परमाणुओं से मिलकर बनी एक प्राकृतिक विषैली गैस है। यह समताप मंडल (Stratosphere) में धरातल से 16 से 25 किमी की ऊंचाई पर सर्वाधिक सांद्रित है, जिसे 'ओजोनोस्फीयर' भी कहते हैं।
- यह सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों (UV-B) को अवशोषित कर एक प्राकृतिक 'सनस्क्रीन' की तरह पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करती है। इसकी मोटाई डॉबसन यूनिट (DU) में मापी जाती है । मापन हेतु डॉबसन स्पेक्ट्रोफोटोमीटर तथा नासा के उपग्रह निम्बस-7 पर लगे TOMS का उपयोग किया जाता है। समताप मंडल में ओजोन परत की मोटाई 200 DU से कम होने की स्थिति को ओजोन छिद्र कहा जाता है।
ओजोन क्षरण के प्रमुख कारण:
- मानव-जनित ओजोन क्षयकारी पदार्थ (ODS) समताप मंडल में मुक्त होकर सक्रिय क्लोरीन व ब्रोमीन रेडिकल्स उत्पन्न करते हैं जो ओजोन का ह्रास करते हैं:
- क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs): रेफ्रिजरेटर, एसी, एरोसोल स्प्रे, फॉर्मिंग एजेंट तथा इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की सफाई हेतु विलायक के रूप में प्रयुक्त।
अभिक्रिया:
अभिक्रिया:
सूर्य का प्रकाश
CF2Cl2 → CF2Cl +
Cl*(सक्रिय क्लोरीन)
Cl* + O3 →ClO* + O2 तथा
ClO* + O → Cl* +O2
- प्रभाव: एक सक्रिय क्लोरीन परमाणु लगभग 1 लाख ओजोन अणुओं को नष्ट कर सकता है।
- हैलॉन्स (Halons): अग्निशामक यंत्रों में प्रयुक्त ब्रोमीन-युक्त यौगिक; एक सक्रिय ब्रोमीन परमाणु लगभग 4 लाख ओजोन अणुओं को नष्ट करने में सक्षम है।
- अन्य रासायनिक यौगिक: कार्बन टेट्राक्लोराइड , क्लोरोफॉर्म , मिथाइल ब्रोमाइड , नाइट्रस ऑक्साइड एवं सल्फेट।
- ध्रुवीय समतापमंडलीय बादल (PSC): ध्रुवीय शीत ऋतु में बनने वाले बर्फ और अम्लीय कणों HNO3, H2SO4 के बादल क्लोरीन को सक्रिय होने के लिए अनुकूल सतह प्रदान करते हैं।
अभिक्रिया -
+ -
H + Cl → HCl
-
ClO + NO2 → ClNO3
संरक्षण हेतु प्रमुख अंतरराष्ट्रीय प्रयास:
वियना सम्मेलन (1985):
- ओजोन परत के संरक्षण हेतु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहला गैर-बाध्यकारी ढांचा तैयार किया गया, जिसमें शोध एवं डेटा साझा करने पर सहमति बनी।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987):
- ODS के उत्पादन एवं उपभोग में चरणबद्ध कटौती हेतु लाया गया एक वैधानिक रूप से बाध्यकारी और सर्वाधिक सफल पर्यावरण समझौता।
- यह 16 सितंबर 1987 को हस्ताक्षरित हुआ (इसी उपलक्ष्य में प्रत्येक वर्ष 16 सितंबर को 'विश्व ओजोन दिवस' मनाया जाता है) तथा 1 जनवरी 1989 से लागू हुआ। भारत 1992 में इसमें शामिल हुआ।
कोपेनहेगन संशोधन (1992 - MoP 4):
- CFCs के उपयोग को पूर्णतः समाप्त करने की समय-सीमा तय की गई (विकसित देशों के लिए 2000 तथा विकासशील देशों के लिए 2010 तक)। भारत ने 2008 में ही इसका उपयोग प्रतिबंधित कर दिया।
किगाली समझौता (2016 - MoP 28):
- HFCs (जो ओजोन को नुकसान नहीं पहुंचाते लेकिन उच्च ग्लोबल वार्मिंग क्षमता रखते हैं) को चरणबद्ध तरीके से 80–85% कम करने हेतु किया गया बाध्यकारी संशोधन। यह 1 जनवरी 2019 से प्रभावी हुआ।
- मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल और इसके अंतर्गत हुए संशोधनों के सफल क्रियान्वयन के फलस्वरूप ओजोन परत में निरंतर सुधार दर्ज किया जा रहा है।