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केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी: कैबिनेट बैठक में ₹5,659.22 करोड़ के परिव्यय के साथ कपास उत्पादकता मिशन को मंजूरी दी।।
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क्रियान्वयन अवधि: 2026-27 से 2030-31 तक (5 वर्ष)
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घोषणा: केंद्रीय बजट 2025-26 में
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मिशन भारत सरकार के 5-F यानी फार्म टू फाइबर टू फैक्टरी टू फेशन टू फॉरेन (खेत से रेशा से कारखाने से फैशन से विदेश तक ) विजन के अनुरूप है।
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प्रमुख उद्देश्य:
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रोग और कीट प्रतिरोधी उच्च उपज वाली किस्मों (HYV) के बीजों का विकास।
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उन्नत कपास उत्पादन तकनीकों (जैसे उच्च घनत्व रोपण प्रणाली - HDPS) का विस्तार।
- अतिरिक्त लंबे रेशे वाली कपास (ईएलएस) को बढ़ावा देना।
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जिनिंग और प्रसंस्करण कारखानों का आधुनिकीकरण।
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'कस्तूरी कॉटन भारत' के तहत मजबूत ब्रांडिंग और वैश्विक मानकीकरण।
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बाजार मंडियों का डिजिटल एकीकरण और पारदर्शी मूल्य निर्धारण को सक्षम बनाना।
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कपास अपशिष्ट की रिसाइकलिंग और सर्कुलर अर्थव्यवस्था की प्रणालियों को बढ़ावा देना।
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प्राकृतिक फाइबर (अलसी, बांस, केले आदि) के साथ विविधीकरण।
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कार्यान्वयन: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ।
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वस्त्र मंत्रालय प्रमुख भागीदार के रूप में शामिल।
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14 राज्यों के 140 जिलों पर प्रारंभिक ध्यान केंद्रित किया जाएगा।
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- लक्ष्य (2031 तक):
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मापदंड |
वर्तमान |
लक्ष्य (2031) |
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उत्पादकता ( किलोग्राम/हेक्टेयर) |
~440 |
755 |
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कुल उत्पादन |
297 लाख गांठ |
498 लाख गांठ |
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गांठ का आकार |
170 किग्रा |
170 किग्रा |
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- लगभग 32 लाख किसानों को लाभ और आत्मनिर्भर बनाना।
- कस्तूरी कॉटन भारत पहल को बढ़ावा देना ।
- अपशिष्ट को 2 प्रतिशत से कम करना।
'कस्तूरी कॉटन भारत' पहल
- मुख्य उद्देश्य: भारतीय कपास की ब्रांडिंग, पहचान और प्रमाणन की गुणवत्ता को सुदृढ़ करना है।
- भारतीय कपास की अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंच का विस्तार करना
- यह पहल वस्त्र मंत्रालय, भारतीय कपास निगम (CCI), व्यापारिक निकायों और औद्योगिक भागीदारों का एक संयुक्त प्रयासों से संचालित है।
- कार्यान्वयन निकाय: कॉटन टेक्सटाइल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (TEXPROCIL) को इस कार्यक्रम के प्रमाणन और ब्रांडिंग कार्यों हेतु मुख्य एजेंसी नियुक्त किया गया है।
- कपास की गांठों की पूर्ण ट्रेसबिलिटी सुनिश्चित करने हेतु ब्लॉकचेन और क्यूआर-कोड आधारित प्रमाणीकरण प्रणाली का प्रयोग किया जाता है।
- प्रमाणन: केवल उच्च गुणवत्ता वाले कपास को ही “कस्तूरी कॉटन” टैग मिलता है। यह शुद्धता, लंबे रेशे, मजबूती और सस्टेनेबिलिटी सुनिश्चित करता है।
- “कस्तूरी” लोगो और मार्क वाले उत्पादों को प्रीमियम कीमत मिलती है। उपभोक्ता आसानी से पहचान सकते हैं कि यह भारत का सर्वश्रेष्ठ कपास है।
भारत में कपास
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उपनाम: कपास को इसके आर्थिक महत्व के कारण 'सफेद सोना' (White Gold) कहा जाता है।
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इतिहास: सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) में 8000 वर्ष पूर्व भी इसकी खेती और बुनाई के साक्ष्य मिले हैं। यह भारत को प्राचीन वैश्विक व्यापार के केंद्र में स्थापित करती थी ।
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भारत में कपास की प्रजातियाँ: भारत विश्व का एकमात्र देश है जहाँ कपास की सभी चार प्रमुख प्रजातियों- आर्बोरियम, हर्बेसियम, बारबाडेंस और हिरसुटम की खेती की जाती है।
भौगोलिक और जलवायु आवश्यकताएं (Geographical and Climatic requirements)
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तापमान: 21°C से 30°C (उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु) ।
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पाला (Frost): इसे कम से कम 210 पाला-रहित दिनों की आवश्यकता होती है ।
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वर्षा: 50 सेमी से 100 सेमी वार्षिक वर्षा।
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मृदा: गहरी काली मिट्टी सर्वोत्तम है क्योंकि इसमें नमी रोकने की क्षमता अधिक होती है ।
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जलोढ़ और लाल-काली मिश्रित मिट्टी में भी खेती संभव है।
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जलप्रवाह युक्त धरातल
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सलहट्टी : उत्तरी कर्नाटक में स्थित काली मिट्टी युक्त क्षेत्र।
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दोङहट्टी दक्षिणी कर्नाटक में स्थित लाल मिट्टी युक्त क्षेत्र।
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किस्में : विकास, विक्रम, विजय, कल्याण, नर्मदा।
भारत के प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्र
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उत्तरी क्षेत्र: पंजाब, हरियाणा, उत्तरी राजस्थान :
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उच्च उत्पादकता । [ अमेरिकन कपास ( लम्बे रेशे) → नरमा ]
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मध्य क्षेत्र: गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश
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काली मिट्टी, सबसे बड़ा क्षेत्र (55%),
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लेकिन मुख्यतः वर्षा-आधारित होने के कारण उत्पादकता कम है ।
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दक्षिणी क्षेत्र : तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक
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लाल-काली मिट्टी, लंबे रेशे (Extra Long Staple - ELS) कपास का मुख्य क्षेत्र ।
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उत्पादन और आँकड़े
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वैश्विक स्थिति:
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क्षेत्रफल (Acreage) में भारत प्रथम।
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उत्पादन में द्वितीय (चीन के बाद)।
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उत्पादकता संकट: भारत में प्रति हेक्टेयर पैदावार (Yield) बहुत कम है क्योंकि 65% खेती वर्षा पर निर्भर है ।
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शीर्ष 3 उत्पादक राज्य (2024-25)-
1. गुजरात
2. महाराष्ट्र
3. तेलंगाना
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सर्वाधिक उत्पादकता - गुजरात।
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सर्वाधिक क्षेत्रफल - महाराष्ट्र
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केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान -नागपुर, महाराष्ट्र
बीटी कपास (Bt Cotton):
- यह व्यावसायिक खेती के लिए भारत में स्वीकृत एकमात्र जीएम (Genetically Modified) फसल है।
- इसे 'अमेरिकन बॉलवर्म' कीट से बचाने के लिए 2002 में लाया गया था ।
- प्रभाव: कीटनाशकों का उपयोग घटा, पैदावार बढ़ी और भारत शुद्ध निर्यातक बना ।