उत्तर:
- वर्तमान वैश्वीकृत युग में वैश्विक व्यापार एक महत्त्वपूर्ण संक्रमण काल से गुजर रहा है। कोविड-19 महामारी, हालिया भू-राजनीतिक संघर्षों और चौथी औद्योगिक क्रांति (तकनीकी प्रगति) ने वैश्विक व्यापार की गतिशीलता को पूरी तरह से बदल दिया है।
वैश्विक व्यापार में उभरती प्रवृत्तियाँ (Emerging Trends):
- आपूर्ति श्रृंखला का पुनर्गठन (Reshaping Supply Chains): चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए देश अब 'चाइना प्लस वन (China+1)' रणनीति अपना रहे हैं। इसके तहत 'फ्रेंडशोरिंग' (मित्र देशों के साथ व्यापार) और 'नियरशोरिंग' (पड़ोसी देशों में उत्पादन) जैसी प्रवृत्तियाँ तेजी से बढ़ रही हैं।
- डिजिटल व्यापार और ई-कॉमर्स में उछाल: भौतिक वस्तुओं के व्यापार की तुलना में डिजिटल सेवाओं (जैसे- क्लाउड कंप्यूटिंग, सॉफ्टवेयर, डिजिटल भुगतान) और क्रॉस-बॉर्डर ई-कॉमर्स में बहुत तेज़ी से वृद्धि हो रही है।
- हरित और संधारणीय व्यापार (Green Trade): जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए व्यापार नीतियों में बदलाव आ रहा है। यूरोपीय संघ द्वारा लागू किया जा रहा 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) इसका प्रमुख उदाहरण है, जो कार्बन-गहन आयातों पर कर लगाता है।
- क्षेत्रीय व्यापार समझौतों (FTAs) में वृद्धि: बहुपक्षीय संस्थाओं की विफलता के कारण देश अब द्विपक्षीय या क्षेत्रीय समझौतों (जैसे- RCEP, IPEF) पर अधिक जोर दे रहे हैं।
वैश्विक व्यापार के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ (Key Challenges):
- बढ़ता संरक्षणवाद और वि-वैश्वीकरण (Deglobalization): 'अमेरिका फर्स्ट' या 'आत्मनिर्भरता' जैसी नीतियों के तहत कई देश अपने घरेलू उद्योगों को बचाने के लिए टैरिफ (आयात शुल्क) बढ़ा रहे हैं और सब्सिडी दे रहे हैं। इससे मुक्त व्यापार की अवधारणा को नुकसान हो रहा है।
- भू-राजनीतिक तनाव: अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध, रूस-यूक्रेन संघर्ष, और हाल ही में लाल सागर (Red Sea) में हूती विद्रोहियों के हमलों ने वैश्विक शिपिंग मार्ग को बाधित कर दिया है। इससे माल ढुलाई की लागत (Freight Cost) और मुद्रास्फीति में भारी वृद्धि हुई है।
- विश्व व्यापार संगठन (WTO) का संकट: WTO अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है। इसका अपीलीय निकाय (Appellate Body) अमेरिका के वीटो के कारण वर्षों से निष्क्रिय है, जिससे व्यापार विवादों का समाधान नहीं हो पा रहा है।
- विकासशील देशों का हाशियाकरण: हरित व्यापार नियम (जैसे CBAM) गैर-टैरिफ बाधाओं की तरह काम कर रहे हैं, जो भारत सहित विकासशील देशों के निर्यात को हतोत्साहित कर रहे हैं। इसके अलावा, डिजिटल डिवाइड के कारण गरीब देश ई-कॉमर्स का पूरा लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।
निष्कर्ष:
- यद्यपि डिजिटल और हरित व्यापार वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए नए अवसर पैदा कर रहे हैं, किन्तु बढ़ता संरक्षणवाद और भू-राजनीतिक अस्थिरता गंभीर चिंता का विषय हैं। अतः एक लचीली, समावेशी और नियम-आधारित वैश्विक व्यापार प्रणाली की आवश्यकता है, जिसमें भारत 'ग्लोबल साउथ' (Global South) की मज़बूत आवाज़ बनकर नीति-निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।