उत्तर:
- अमीर खुसरो (1253-1325 ई.), जिनका मूल नाम अबुल हसन यमीनुद्दीन खुसरो था, मध्यकालीन भारत के एक महान सूफी संत, कवि, इतिहासकार और संगीतकार थे। वे प्रसिद्ध सूफी संत निज़ामुद्दीन औलिया के प्रमुख शिष्य थे। उन्होंने गुलाम वंश के बलबन से लेकर तुगलक वंश के गयासुद्दीन तुगलक तक दिल्ली सल्तनत के 7 (कुछ स्रोतों के अनुसार 8) सुल्तानों का शासनकाल देखा था। उनकी बहुमुखी प्रतिभा और प्रगाढ़ राष्ट्रप्रेम के कारण उन्हें 'तूती-ए-हिंद' (भारत का तोता) कहा जाता है।
उनके साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान-
1. साहित्यिक योगदान:
- 'खड़ी बोली' और 'हिन्दवी' के जनक: खुसरो को हिन्दी खड़ी बोली का प्रथम लोकप्रिय कवि माना जाता है। उन्होंने जनसामान्य की भाषा 'हिन्दवी' (हिन्दी, उर्दू और फारसी का प्रारंभिक मिश्रण) का प्रयोग किया, जिसने आगे चलकर उर्दू और आधुनिक हिन्दी का मार्ग प्रशस्त किया।
- ऐतिहासिक ग्रंथों की रचना: दरबारी इतिहासकार के रूप में उनकी रचनाएँ सल्तनत कालीन राजनीति और समाज का प्रामाणिक स्रोत हैं:
- खज़ाइन-उल-फुतूह (तारीख-ए-अलाई): इसमें अलाउद्दीन खिलजी के दक्षिण अभियानों, बाजार नियंत्रण और आर्थिक सुधारों का विस्तृत वर्णन है।
- तुगलकनामा: यह गयासुद्दीन तुगलक के सत्ता प्राप्ति का प्रामाणिक वृत्तांत है।
- नूह-सिपिहर: इसमें खुसरो ने भारत की जलवायु, पशु-पक्षियों और संस्कृति की भूरि-भूरि प्रशंसा की है तथा भारत को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ बताया है।
- आशिका और मिफ्ताह-उल-फुतूह: 'आशिका' में देवल रानी और खिज्र खां की प्रेम कथा है, जबकि 'मिफ्ताह-उल-फुतूह' में जलालुद्दीन खिलजी के सैन्य अभियानों का जिक्र है।
- काव्य शैलियों का विकास: उन्होंने फारसी कविता में 'सबक-ए-हिन्दी' (भारतीय शैली) का विकास किया। साथ ही पहेलियां, मुकरियां, 'दो सखुने' और गज़ल लेखन को लोकप्रिय बनाकर लोक-साहित्य को अत्यधिक समृद्ध किया।
2. सांस्कृतिक एवं सांगीतिक योगदान:
- नवीन वाद्य यंत्रों का आविष्कार: खुसरो ने भारतीय और इस्लामी (फ़ारसी) संगीत परंपराओं का अद्भुत समन्वय किया। उन्होंने दक्षिण भारतीय 'वीणा' और ईरानी 'तंबूरे' को मिलाकर 'सितार' का आविष्कार किया। साथ ही, पखावज (मृदंग) को दो भागों में बांटकर 'तबला' बनाने का श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता है।
- गायन शैलियों का विकास: सूफी खानकाहों में गाए जाने वाले भक्ति संगीत को उन्होंने एक नया रूप दिया और 'कव्वाली' गायन शैली का जनक उन्हें ही माना जाता है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने 'तराना' और 'ख्याल' गायन शैली का भी सूत्रपात किया।
- नवीन रागों का सृजन: उन्होंने भारतीय रागों में फारसी धुनों का मिश्रण करके कई नए राग बनाए, जैसे— यमन, घोर, सनम, जिलफ, और साजगीरी।
- गंगा-जमुनी तहज़ीब के प्रणेता: खुसरो सच्चे अर्थों में धर्मनिरपेक्ष और समन्वयवादी संस्कृति के प्रतीक थे। उन्होंने अपनी कला और सूफी विचारधारा के माध्यम से हिंदू-मुस्लिम एकता तथा भारत की समिश्र संस्कृति 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' की मजबूत नींव रखी।
निष्कर्ष:
⇒ अमीर खुसरो केवल एक दरबारी कवि या इतिहासकार मात्र नहीं थे, बल्कि वे मध्यकालीन भारतीय संस्कृति के एक ऐसे स्तंभ थे जिन्होंने साहित्य, भाषा और संगीत के क्षेत्र में विदेशी (फारसी) और स्वदेशी (भारतीय) तत्त्वों का अभूतपूर्व समन्वय किया। उनका यह योगदान आज भी भारतीय संस्कृति, विशेषकर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत और लोक-साहित्य में पूर्णतः जीवंत है।