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आयकर अधिनियम-2025

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  • प्रभावी: 1 अप्रैल, 2026

  • कार्यान्वयन हेतु केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड(CBDT) ने 20 मार्च, 2026 को 'आयकर नियम, 2026' अधिसूचित किए।

  • मुख्य उद्देश्य

    • भाषाई सरलीकरण: अप्रचलित शब्दावली और जटिल प्रावधानों के स्थान पर आधुनिक, स्पष्ट और संक्षिप्त कानूनी भाषा का प्रयोग करना।
    • डिजिटल समावेशन: फेसलेस मूल्यांकन और डिजिटल अनुपालन को बढ़ावा देकर भ्रष्टाचार को नियंत्रित करना और मानवीय हस्तक्षेप को न्यूनतम बनाना।
    • करदाता सुविधा: पारदर्शिता में वृद्धि कर फाइलिंग की प्रक्रिया को सुगम बनाना और कानूनी विवादों में कमी लाना।
    • वैश्विक तालमेल: वैश्विक आय और डिजिटल संपत्तियों पर कराधान जैसी वर्तमान आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप कानून को वैश्विक स्तर पर सुसंगत बनाना।
  • संरचनात्मक परिवर्तन हेतु तीन मार्गदर्शक सिद्धांत का पालन

    • कानूनी स्पष्टता और निरंतरता बढ़ाने के लिए पाठ्य व संरचनात्मक स्तर पर सुधार करना।

    • कर नीति में किसी भी प्रकार के बड़े बदलाव से बचते हुए स्थायित्व और निश्चितता सुनिश्चित करना।

    • करदाताओं की वर्तमान अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए कर की दरों को पूर्ववत बनाए रखना।

  • प्रमुख सुधार:

    • सरलीकरण: आयकर नियमों और फॉर्मों का सरलीकरण ताकि वे आम नागरिकों के लिए समझने योग्य हों

    • “कर वर्ष” (Tax Year): इसमें ‘आकलन वर्ष’ और “पिछले वित्त वर्ष” के स्थान पर ‘कर वर्ष’ की अवधारणा प्रस्तुत की गई है।

      • इसे वित्तीय वर्ष की 12 महीने की अवधि के रूप में परिभाषित किया गया है जो 1 अप्रैल से शुरू होती है।

    • योजनाओं को आकार देने में मदद: यह अधिनियम केंद्र सरकार को कर प्रशासन में दक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही में सुधार के उद्देश्य से नई योजनाओं को तैयार करने के लिए अधिकृत करता है (धारा 532)

      • यह निम्नलिखित तरीकों से किया जा सकता है:

        • तकनीकी रूप से संभव सीमा तक करदाता या किसी अन्य व्यक्ति के साथ इंटरफेस को समाप्त करना, और

        • आर्थिक अनुकूलता और कार्यात्मक विशिष्टीकरण के माध्यम से संसाधनों के उपयोग को अनुकूल बनाना

    • सरल अनुपालन: अधिक स्पष्टता के लिए कई प्रावधानों को एक साथ लाया गया है। उदाहरण के लिए, स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) से संबंधित प्रावधान, जो पहले कई धाराओं में विभाजित थे, अब सुव्यवस्थित कर दिए गए हैं और उन्हें एक ही धारा - धारा 393 - के अंतर्गत समूहीकृत कर दिया गया है।

    • डिजिटल फर्स्ट एनफोर्समेंट: यह अधिनियम वर्चुअल डिजिटल परिसंपत्तियों को परिभाषित करता है,जिसमें ईमेल, क्लाउड सर्वर, ऑनलाइन निवेश एवं ट्रेडिंग खाते तथा कर प्रवर्तन हेतु वेबसाइटें सम्मिलित हैं।

      • डिजिटल संपत्तियों की परिभाषा को व्यापक बनाते हुए इसमें क्रिप्टोकरंसी या क्रिप्टोग्राफिक लेजर सिस्टम जैसी समान प्रौद्योगिकियों के माध्यम से संचालित होने वाली परिसंपत्तियां भी शामिल किया गया है।

    • यह आधिकारिक तौर पर सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) को कर लेनदेन के लिए एक वैध भुगतान माध्यम के रूप में मान्यता देता है