उत्तर :
- जेनेटिक इंजीनियरिंग (Genetic Engineering) वह वैज्ञानिक तकनीक है जिसके द्वारा किसी जीव (पौधे, जानवर या सूक्ष्मजीव) के DNA या जीनोम में कृत्रिम रूप से बदलाव (Insertion, Deletion या Modification) किया जाता है, ताकि उसमें मनचाहे नए गुण विकसित किए जा सकें।
जेनेटिक इंजीनियरिंग के नैतिक और व्यावहारिक पहलू
- यह तकनीक एक दोधारी तलवार की तरह है। इसके पक्ष और विपक्ष निम्नलिखित हैं:
पक्ष (वरदान):
- खाद्य सुरक्षाः बढ़ती जनसंख्या के लिए सीमित भूमि पर अधिक पैदावार सुनिश्चित करना।
- जलवायु लचीलापनः सूखा, बाढ़ और खारे पानी को सहन करने वाली फसलें बनाना (उदा. बाढ़ प्रतिरोधी Sub1A चावल) ।
- कुपोषण का अंतः फसलों में पोषक तत्वों की वृद्धि (उदा. विटामिन A युक्त गोल्डन राइस)।
विपक्ष (चिंताएं):
- स्वास्थ्यः एलर्जी या नए टॉक्सिन्स विकसित होने का खतरा।
- पारिस्थितिकीः 'सुपरवीड्स' (Superweeds) का उदय और प्राकृतिक जैव-विविधता का ह्रास।
- नैतिकः प्राकृतिक प्रजातियों के साथ छेड़छाड़ और स्वदेशी किस्मों का विलोपन।
कृषि पर प्रभाव
| सकारात्मक प्रभाव | नकारात्मक प्रभाव |
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उत्पादकता में वृद्धि (उदा. भारत में Bt कपास के उपयोग से पैदावार में 24% वृद्धि और कीटनाशकों का कम खर्च)। |
कॉर्पोरेट एकाधिकार (IPR के जरिए कीमतों पर नियंत्रण) जिससे छोटे किसानों पर आर्थिक बोझ । |
| आयात पर निर्भरता में कमी (उदा. GM सरसों-DMH11 से स्वदेशी खाद्य तेल उत्पादन में वृद्धि की संभावना)। | गैर-लक्षित कीटों, मित्र-कीटों और मधुमक्खियों जैसे परागणकों को संभावित नुकसान। |
व्यावहारिक समाधान और निष्कर्ष
- भारत में GEAC के माध्यम से पारदर्शी और कठोर विनियामक ढांचे की आवश्यकता है। साथ ही, सरकारी अनुसंधान संस्थानों (जैसे ICAR) द्वारा स्वदेशी व किफायती बीजों का विकास किया जाना चाहिए। निष्कर्षतः, यदि इसे 'एहतियाती सिद्धांत' (Precautionary Principle) के साथ अपनाया जाए, तो जेनेटिक इंजीनियरिंग कृषि संकट के समाधान हेतु एक वरदान साबित हो सकती है।