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​प्रश्न: 'भारत की सतत आर्थिक वृद्धि के लिए केवल आयात प्रतिस्थापन पर्याप्त नहीं है, बल्कि निर्यात-उन्मुख औद्योगिकीकरण समय की सबसे बड़ी मांग है।' इस कथन के प्रकाश में, भारत के हालिया नीतिगत प्रयासों का मूल्यांकन कीजिए। (UPSC/RAS)

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​उत्तर-

  • किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए 'आयात प्रतिस्थाप' (घरेलू स्तर पर उत्पादन कर आयात कम करना) विदेशी मुद्रा बचाने की एक रणनीति है, परंतु यह सतत वृद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है। भारत के समावेशी विकास, रोजगार सृजन और वैश्विक मूल्य श्रृंखला (Global Value Chain) में हिस्सेदारी के लिए 'निर्यात-उन्मुख औद्योगिकीकरण' वर्तमान की सबसे बड़ी मांग है। इसे साकार करने के लिए भारत सरकार ने द्विपक्षीय रणनीति (आयात में कमी और निर्यात में वृद्धि) अपनाई है।

​आयात को कम करने के लिए किए गए प्रयास:

  1. ​कच्चा तेल: आयात पर निर्भरता घटाने के लिए घरेलू उत्पादन में वृद्धि, पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग और इलेक्ट्रॉनिक वाहनों (EVs) को बढ़ावा दिया जा रहा है।
  2. ​स्वर्ण आयात: सोने के आयात को कम करने हेतु 'सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड' (SGB) और 'गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम' प्रारंभ की गई है।
  3. ​सस्ते आयात पर नियंत्रण: चीन आदि से होने वाले सस्ते आयात को रोकने के लिए गुणवत्ता मानक तय किए गए हैं, तथा 'आत्मनिर्भर भारत अभियान' के माध्यम से घरेलू विनिर्माण को सशक्त किया जा रहा है।

​निर्यात को बढ़ाने के लिए किए गए प्रमुख नीतिगत प्रयास:

  1. ​विदेशी व्यापार नीति (FTP) 2023: इस नीति का महत्वाकांक्षी लक्ष्य 2030 तक भारत के कुल निर्यात को बढ़ाकर $2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचाना है। यह नीति 4 स्तंभों पर टिकी है— प्रोत्साहन से छूट की ओर, सहयोग के माध्यम से निर्यात प्रोत्साहन, व्यापार सुगमता, और उभरते हुए क्षेत्रों पर ध्यान
  2. ​निर्यात प्रोत्साहन मिशन: निर्यात को गति देने के लिए 2025 में यह मिशन लाया गया है। इसकी कार्यान्वयन अवधि 6 वर्ष (2025-26 से 2030-31) है और इसका कुल बजट 25,060 करोड़ रुपये निर्धारित है। इसके दो मुख्य अंग हैं:   
    ⇒ निर्यात प्रोत्साहन: इसके तहत सरकार वित्तीय सहायता, ऋण (क्रेडिट) गारंटी और बीमा सुविधा प्रदान करती है।
    ⇒ ​निर्यात दिशा: यह बाजार अनुसंधान और ब्रांडिंग जैसी गैर-वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
  3. कर लागत में कमी व प्रोत्साहन: निर्यातकों द्वारा चुकाए गए करों की छूट/पुनर्भुगतान के लिए RoDTEP, EPCG, Duty Drawback और Advance Authorisation Scheme जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं। साथ ही, घरेलू उत्पादन बढ़ाने व विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए PLI योजना लागू की गई है।
  4. ​विश्वस्तरीय निर्यात अवसंरचना: 1965 में कांडला (गुजरात) में देश के पहले EPZ (निर्यात प्रसंस्करण केंद्र) की स्थापना से लेकर SEZ (विशेष आर्थिक क्षेत्र - नीति 2000, अधिनियम 2005) का विकास किया गया है। यहाँ स्थापित उद्योगों को कर लाभ दिए जाते हैं, बशर्ते वे उत्पादों का निर्यात करें।
  5. ​स्थानीय उत्पादों की पहचान: जमीनी स्तर पर निर्यात ढांचे को सशक्त करने के लिए 'District as Export Hub', 'ODOP' (One District One Product), 'Town of Export Excellence' और 'Trade Infrastructure for Export Scheme' लागू की गई हैं।
  6. ​मुक्त व्यापार समझौते (FTAs): भारतीय उत्पादों की वैश्विक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए UAE, ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया, ओमान और आसियान (ASEAN) के साथ मुक्त व्यापार समझौते किए गए हैं। UK और EU के साथ वार्ताएं प्रगति पर हैं।

निष्कर्ष:

⇒ उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत अब केवल 'आयात प्रतिस्थापन' के संरक्षणवादी मॉडल तक सीमित नहीं है। FTP 2023 के $2 ट्रिलियन के लक्ष्य और 25,060 करोड़ रुपये के नए 'निर्यात प्रोत्साहन मिशन' जैसे कदम यह साबित करते हैं कि सरकार 'निर्यात-उन्मुख औद्योगिकीकरण' को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। इन नीतियों का प्रभावी क्रियान्वयन ही भारत को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने और सतत आर्थिक वृद्धि प्राप्त करने में सफल बनाएगा।