- हाल ही में (18 मई 2026 को), न्यायमूर्ति श्री यशवंत वर्मा से जुड़े आरोपों की जांच कर रहे न्यायाधीश जांच समिति ने लोकसभा अध्यक्ष को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप दी है।
- न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत वैधानिक आवश्यकताओं के अनुपालन में प्रस्तुत की गई इस रिपोर्ट को जल्द ही संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखा जाएगा।
- समिति की संरचना: न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के प्रावधानों के अनुसार इस त्रिसदस्यीय समिति में निम्नलिखित न्यायिक सदस्य शामिल थे-
- अध्यक्ष: न्यायमूर्ति अरविंद कुमार (न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय)।
- न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर (मुख्य न्यायाधीश, बंबई उच्च न्यायालय)।
- श्री बी.वी. आचार्य (वरिष्ठ अधिवक्ता, कर्नाटक उच्च न्यायालय)।
- समिति का गठन : 12 अगस्त 2025 को लोक सभा अध्यक्ष द्वारा किया गया था।
संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 124(4): सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को पद से हटाने के आधार और प्रक्रिया का उल्लेख करता है।
- अनुच्छेद 124(5): संसद को सर्वोच्च न्यायालय (और उच्च न्यायालयों) के न्यायाधीशों को उनके पद से हटाने (महाभियोग) की प्रक्रिया, दुर्व्यवहार या अक्षमता की जांच और उसे साबित करने से जुड़े विस्तृत नियम और कानून बनाने का अधिकार देता है।
- अनुच्छेद 217(1)(b): यह प्रावधान करता है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को भी उसी प्रक्रिया (अनुच्छेद 124(4)) के माध्यम से हटाया जाएगा जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के लिए निर्धारित है।
- संवैधानिक आधार: केवल दो
- 'साबित कदाचार' (Proved Misbehaviour)
- 'असमर्थता' (Incapacity)।
न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968
- यह अधिनियम सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों पर लगे आरोपों की जांच करने और उन्हें पद से हटाने की संसदीय प्रक्रिया को विनियमित करता है।
हटाने की प्रक्रिया
- प्रस्ताव की शुरुआत: न्यायाधीश को हटाने का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है।
- लोक सभा में प्रस्ताव हेतु न्यूनतम 100 सदस्यों के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं।
- राज्य सभा में इसके लिए कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर आवश्यक हैं।
- इस समिति में शामिल होते हैं:
- सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश।
- किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश।
- प्रतिष्ठित विधिवेत्ता।
- यदि समिति न्यायाधीश को दोषी नहीं पाती है, तो प्रक्रिया यहीं समाप्त हो जाती है।
- यदि समिति न्यायाधीश को कदाचार या असमर्थता का दोषी पाती है, तो सदन में मूल प्रस्ताव पर विचार और बहस की जा सकती है।