उत्तर-
→विजयनगर साम्राज्य दक्षिण भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का महत्वपूर्ण केंद्र था। यहाँ के शासकों ने साहित्य, कला तथा धर्म को संरक्षण देकर शास्त्रीय भाषाओं के विकास और धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा दिया।
शास्त्रीय भाषाओं को संरक्षण देने में विजयनगर साहित्य का प्रभाव:-
1. तेलुगू साहित्य-
- कृष्णदेवराय का योगदान- कृष्णदेवराय द्वारा रचित तेलुगू शास्त्रीय ग्रंथ “अमुक्तमाल्यद” अपनी उत्कृष्ट साहित्यिक शैली और सांस्कृतिक महत्त्व के लिए प्रसिद्ध है।
- अष्टदिग्गजों का योगदान- दरबार ने अल्लासानी पेड़न्ना जैसे महान तेलुगू कवियों को संरक्षण दिया, जिनकी कृति “मनुचरित्रमु” तेलुगू साहित्य के पंचकाव्यों में प्रमुख स्थान रखती है।
2. कन्नड़ साहित्य-
- कवियों का संरक्षण- विजयनगर के शासक कृष्णदेवराय ने कुमार व्यास जैसे कन्नड़ साहित्यकारों को संरक्षण प्रदान किया, जिन्होंने महाभारत को “कर्नाटक भारत कथामंजरी” के रूप में पुनः प्रस्तुत किया।
- प्रमुख कृतियाँ- इस कालखंड में कन्नड़ साहित्य का उल्लेखनीय विकास हुआ, जिसमें लक्ष्मीषा द्वारा रचित “जैमिनी भारत” तथा विरुपाक्ष पंडिता की “चन्नवसवपुराण” जैसी महत्वपूर्ण कृतियों ने साहित्यिक, धार्मिक और सांस्कृतिक समृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
3. संस्कृत साहित्य-
- संस्कृत साहित्य का पुनर्लेखन- विजयनगर काल में संस्कृत साहित्य का पुनरुत्थान हुआ, जिसमें विद्यारण्य जैसे महान विद्वानों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी रचना “सर्वदर्शनसंग्रह” में विभिन्न भारतीय दार्शनिक पद्धतियों का विस्तृत एवं सारगर्भित विवेचन प्रस्तुत किया गया है।
- संस्कृत कवियों को प्रश्रय- विजयनगर दरबार ने संस्कृत कवियों एवं विद्वानों को व्यापक संरक्षण प्रदान किया, जिसके फलस्वरूप साहित्यिक, धार्मिक तथा दार्शनिक रचनाओं की समृद्ध परंपरा विकसित हुई।
धार्मिक सद्भाव को बढ़ावा देने में विजयनगर साहित्य का प्रभाव:-
1. भक्ति आंदोलन को गति-
- भक्ति संतों की भूमिका- कन्नड़ के पुरंदरदास और तेलुगू के अन्नामाचार्य जैसे भक्त कवियों ने अनेक भक्ति गीतों की रचना की, जिनमें कर्मकांड और अनुष्ठानों की अपेक्षा व्यक्तिगत भक्ति तथा ईश्वर के प्रति आंतरिक समर्पण को अधिक महत्त्व दिया गया।
- भक्ति संत साहित्य- इस काल में विभिन्न भाषाओं में भक्ति साहित्य का व्यापक विकास हुआ, जिसने जाति एवं धार्मिक भेदभाव से ऊपर उठकर भक्ति, समानता और ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत समर्पण की भावना को प्रोत्साहित किया।
2. धार्मिक प्रथाओं का अभिलेखीकरण-
- मंदिर अभिलेख- इस काल के साहित्य में शिलालेखों एवं मंदिर अभिलेखों का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है, जिनमें विभिन्न धार्मिक समुदायों से जुड़े दान, अनुष्ठानों और परंपराओं का उल्लेख मिलता है। ये अभिलेख तत्कालीन धार्मिक सहिष्णुता, सद्भाव और सांस्कृतिक समन्वय को प्रतिबिंबित करते हैं।
- प्राचीन साहित्य का एकीकरण- इस काल में रचित अनेक महाकाव्यों और पुराणों में विभिन्न धार्मिक समुदायों के मध्य सहिष्णुता, सहयोग, सौहार्द और पारस्परिक सम्मान की भावनाओं को विशेष रूप से प्रतिपादित किया गया।
3. विविध धार्मिक परंपराओं का समावेशन-
- उस समय की साहित्यिक कृतियों में विभिन्न धार्मिक परंपराओं का समन्वय दिखाई देता था, जो विजयनगर साम्राज्य की उदार एवं समन्वयकारी संस्कृति का परिचायक था। अनेक ग्रंथों में हिंदू देवताओं की उपासना के साथ-साथ सूफी तथा अन्य आध्यात्मिक परंपराओं के प्रभाव भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं।
⇒ शास्त्रीय भाषाओं के संरक्षण और धार्मिक सद्भाव के प्रसार में विजयनगर साहित्य की विरासत आज भी भारतीय सांस्कृतिक एवं साहित्यिक परंपराओं को प्रभावित करती है। यह विरासत हमारी सांस्कृतिक एकता, विविधता और ऐतिहासिक पहचान को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।