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​प्रश्न: सुपोषण (Eutrophication) से आप क्या समझते हैं? जल निकायों में इसकी कार्यप्रणाली को स्पष्ट करते हुए जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों तथा इसके प्रभावी नियंत्रण उपायों की विवेचना कीजिए। (UPSC/RAS)

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​उत्तर:

  • सुपोषण वह प्रक्रिया है जिसकी शुरुआत जलीय निकायों—जैसे तालाब, झील, नदी अथवा आर्द्रभूमि—में पोषक तत्वों (विशेष रूप से नाइट्रोजन और फॉस्फोरस) की मात्रा बढ़ने के साथ होती है। इन अतिरिक्त पोषक तत्वों के कारण जल में शैवाल तथा सूक्ष्म पादपों की अनियंत्रित वृद्धि होती है। अंततः इसके परिणामस्वरूप जलीय जैव विविधता की भारी हानि होती है तथा संबंधित जल निकाय का क्षय (मृत्यु) हो जाता है। यद्यपि यह झीलों के प्राकृतिक भराव की एक मंद भू-वैज्ञानिक प्रक्रिया है, किंतु मानवीय गतिविधियों के कारण इसकी दर अत्यधिक तीव्र हो गई है, जिसे 'सांस्कृतिक सुपोषण' (Cultural Eutrophication) कहा जाता है। 

​सुपोषण की कार्यप्रणाली (क्रियाविधि):

  • जल निकायों में सुपोषण की प्रक्रिया क्रमिक चरणों में पूरी होती है:
  • ​पोषक तत्वों का प्रवेश: कृषि अपवाह (खेतों का बहता पानी), घरेलू अपशिष्ट, मलमूत्र तथा औद्योगिक उत्प्रवाह के माध्यम से भारी मात्रा में नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस जल निकायों में मिल जाते हैं।  
  • ​शैवाल प्रस्फुटन (Algal Bloom): तालाब व झील में पोषक तत्वों की प्रचुरता के कारण शैवाल (Algae) की अत्यधिक तीव्र वृद्धि होने लगती है, जिसे 'शैवाल प्रस्फुटन' कहते हैं।
  • ​सूर्य के प्रकाश का अवरोध: शैवाल की एक सघन हरी परत जल की ऊपरी सतह पर बिछ जाती है। इससे सूर्य का प्रकाश नीचे मौजूद जलीय पौधों तक नहीं पहुँच पाता, जिससे उनका प्रकाश-संश्लेषण रुक जाता है और वे मरने लगते हैं।  
  • ​BOD में वृद्धि एवं DO का ह्रास: मृत शैवाल और पौधों का अपघटन करने के लिए जीवाणु (बैक्टीरिया) जल में घुली ऑक्सीजन (DO - Dissolved Oxygen) का अत्यधिक उपभोग करते हैं। फलस्वरूप जल की जैव-रासायनिक ऑक्सीजन माँग (BOD - Biochemical Oxygen Demand) तेज़ी से बढ़ जाती है और घुली ऑक्सीजन का स्तर अत्यंत न्यूनतम हो जाता है।  
  • ​मृत क्षेत्र (Dead Zones) का निर्माण: जल में घुलित ऑक्सीजन का स्तर बेहद कम होने (Hypoxia) के कारण मछलियाँ तथा अन्य जलीय जीव दम घुटने से मरने लगते हैं और वह जल निकाय एक निष्प्राण "मृत क्षेत्र" में बदल जाता है। 

​सुपोषण के प्राथमिक कारण:

इसके प्रमुख कारण दो वर्गों में विभाजित हैं:

​मानवजनित कारक:

  • ​रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग: खेतों में प्रयुक्त होने वाले नाइट्रोजन व फॉस्फोरस युक्त उर्वरक (यूरिया, डीएपी आदि) वर्षा जल के साथ बहकर जलस्रोतों तक पहुँचते हैं।  
  • ​घरेलू अपशिष्ट व डिटर्जेंट: बिना उपचारित किया गया सीवेज जल तथा फॉस्फेट-युक्त डिटर्जेंट का जलस्रोतों में विसर्जन।  
  • ​पशुपालन एवं औद्योगिक उत्प्रवाह: पशुपालन अपशिष्टों तथा औद्योगिक अपशिष्ट जल का सीधे नदियों व झीलों में बहाया जाना।

​प्राकृतिक कारक:

  • ​भारी वर्षा, भूस्खलन तथा मिट्टी के कटाव (मृदा अपरदन) के कारण आसपास की ज़मीन के खनिज व पोषक तत्व प्राकृतिक रूप से जलाशयों में समाहित हो जाते हैं।  

​जलीय पारिस्थितिकी तंत्र एवं मानव जीवन पर दुष्प्रभाव:

  • ​यह जलाशयों के महत्वपूर्ण संसाधनों—जैसे भोजन (मछली), औषधि, चारा आदि—को पूरी तरह नष्ट कर देता है।  
  • ​घुलित ऑक्सीजन (DO) का स्तर 4 mg/L से कम होते ही जलीय जीवों का जीवन संकट में पड़ जाता है, जिससे जलीय जैव विविधता को भारी क्षति पहुँचती है।
  • ​सायनोबैक्टीरिया (नीली-हरी काई) द्वारा छोड़े गए विषाक्त पदार्थ (Toxins) पीने के पानी को ज़हरीला बना देते हैं, जिससे पशुओं एवं मनुष्यों में यकृत व तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियाँ पैदा हो सकती हैं।  
  • ​जल में दुर्गंध, मैलापन और गंदा स्वाद आने से जलाशयों का प्राकृतिक सौंदर्य समाप्त हो जाता है, जिससे पर्यटन गतिविधियाँ ठप पड़ जाती हैं।  
  • ​कार्बनिक मलबे के लगातार तलछट में बैठने से जल निकाय उथले होते चले जाते हैं और अंततः दलदल में बदलकर अपना आर्थिक व पारिस्थितिक महत्व खो देते हैं।

​सुपोषण के प्रभावी नियंत्रण एवं निवारण के उपाय:

  • ​खेतों तथा जलस्रोतों के चारों ओर जैविक व प्राकृतिक कृषि को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए तथा रासायनिक खादों का प्रयोग सीमित करना चाहिए।  
  • ​जल निकायों के किनारों पर हरी पट्टी (Riparian Buffer Zones) बनाई जाए, ताकि बहकर आने वाले पोषक तत्वों को पेड़-पौधों की जड़ें पहले ही सोख लें।
  • ​औद्योगिक अपशिष्टों को जल निकायों में विसर्जित करने से पूर्व एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ETP) द्वारा अनिवार्य रूप से उपचारित किया जाए।  
  • ​घरेलू अपशिष्ट और सीवेज जल को सीधे तालाब या नदी में न डालकर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) में तृतीयक स्तर (Tertiary Treatment) तक उपचारित किया जाए, जिससे नाइट्रोजन व फॉस्फोरस को अलग किया जा सके।  
  • ​डिटर्जेंट और साबुनों में फॉस्फेट के इस्तेमाल पर विनियामक रोक लगाई जानी चाहिए।
  • ​जलाशयों की समय-समय पर ड्रेजिंग (गाद व तलछट की सफाई) की जानी चाहिए और जल में कृत्रिम वायु-संचार (Aeration) के माध्यम से ऑक्सीजन का स्तर सुधारा जाए।

निष्कर्ष:

  • सुपोषण जल सुरक्षा तथा पर्यावरण के लिए एक गंभीर संकट है। इस जटिल समस्या को दूर करने के लिए सामूहिक रूप से मिलकर कड़े नियामक प्रयास करने, सीवेज तंत्र को सुदृढ़ बनाने तथा स्वच्छता व जल संरक्षण पर विशेष बल देने की आवश्यकता है।