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चुनाव के पश्चात् राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ 

  • तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 में, तमिझागा वेत्री कड़गम (TVK) 234 सीटों वाली विधानसभा में 108 सीटें हासिल कर सबसे बड़े दल के रूप में सामने आई। इस चुनाव में DMK को 59 और AIADMK को 47 सीटें प्राप्त हुईं।

  • विवादास्पद स्थिति: राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर द्वारा TVK नेता सी. जोसेफ विजय को सरकार बनाने का निमंत्रण देने में शुरुआती हिचकिचाहट से विवाद खड़ा हो गया। राज्यपाल ने शपथ ग्रहण से पूर्व विधायकों के हस्ताक्षरित रजिस्टर (muster roll) की मांग की थी।

  • "वरीयता क्रम" का उल्लंघन: राजनीतिक पक्षपात के कारण स्थापित परंपराओं के उल्लंघन के उदाहरण पूर्व में भी (जैसे 2017 में मणिपुर और गोवा) देखे गए हैं।

संवैधानिक प्रावधान और परंपराएं

  • राज्यपाल का उत्तरदायित्व: चुनावोपरांत राज्यपाल का मुख्य कार्य उस व्यक्ति को सरकार गठन हेतु आमंत्रित करना है, जो सदन का विश्वास प्राप्त करने में सक्षम प्रतीत हो।

  • फ्लोर टेस्ट (Floor Test) की महत्ता: अनुच्छेद 164(2) के सिद्धांतों के तहत बहुमत सिद्ध करने का एकमात्र संवैधानिक स्थान सदन का पटल (Floor of the House) है। राज्यपाल के पास शपथ से पहले विधायकों के हस्ताक्षर युक्त रजिस्टर मांगने की कोई कानूनी शक्ति नहीं है।

प्रमुख आयोगों की अनुशंसाएं

  • सरकारिया (1988), वेंकटचलैया (2002) और पुंछी (2010) आयोगों ने त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति के लिए एक स्पष्ट "प्राथमिकता का क्रम" निर्धारित किया है:

    • स्पष्ट बहुमत: बहुमत प्राप्त दल के नेता को सीधा आमंत्रण।

    • त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में वरीयता:

1. चुनाव-पूर्व बना गठबंधन।

2. बसे बड़े राजनीतिक दल को।

3. चुनाव के बाद बना नया गठबंधन।

4. बाहरी समर्थन वाला चुनाव-पश्चात गठबंधन।

  • सुधार प्रस्ताव: जस्टिस कुरियन जोसेफ समिति ने राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों को स्पष्ट करने हेतु संविधान में नई अनुसूची जोड़ने का परामर्श दिया है।

सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय

  • सरकार गठन में राज्यपाल के विवेकाधिकार के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने कई मौकों पर हस्तक्षेप किया है:
    • S.R. बोम्मई मामला (1994): बहुमत निर्धारित करने में 'फ्लोर टेस्ट' (सदन के पटल पर परीक्षण) की सर्वोच्चता स्थापित की।

    • रामेश्वर प्रसाद मामला (2006): राज्य विधानसभाओं को भंग करने के लिए राज्यपाल की शक्तियों के दुरुपयोग को संबोधित किया।

    • कर्नाटक मामला (2018): सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय दल-बदल को बढ़ावा देने जैसा है और फ्लोर टेस्ट की समय-सीमा को घटाकर एक दिन कर दिया।

 भारत में अल्पमत सरकारों की मिसालें

  • अग्रिम पूर्ण बहुमत की मांग भारत के संसदीय व्यवहार में अल्पमत सरकारों के लंबे इतिहास की अनदेखी करती है:

    • अटल बिहारी वाजपेयी (1996): बिना प्रारंभिक बहुमत के राष्ट्रपति द्वारा शपथ दिलाई गई और इसे साबित करने के लिए 13 दिन का समय दिया गया (मतदान से पहले इस्तीफा दे दिया)।

    • पी.वी. नरसिम्हा राव (1993): पांच साल तक अल्पमत सरकार का नेतृत्व किया और अविश्वास प्रस्ताव में एक वोट से बचे।

    • एच.डी. देवेगौड़ा और आई.के. गुजराल की संयुक्त मोर्चा सरकारें, साथ ही मनमोहन सिंह (2004) के नेतृत्व वाली पहली यूपीए सरकार, जिसने बाहरी समर्थन के साथ पूरा कार्यकाल चलाया।

आगे की राह और आवश्यक सुधार

  • सर्वोच्च न्यायालय को तीन प्रस्तावों को निश्चित रूप से तय करना चाहिए:

  1. आयोग के दिशा-निर्देशों का पालन: राज्यपालों को सरकारिया, वेंकटचलैया और पुंछी आयोगों द्वारा निर्धारित प्राथमिकता के क्रम का सख्ती से पालन करना चाहिए और शपथ से पहले पूर्ण बहुमत के प्रमाण की मांग नहीं करनी चाहिए।

  2. फ्लोर टेस्ट की सर्वोच्चता: किसी भी अन्य सरकार की तरह, एक अल्पमत सरकार भी केवल सदन के पटल पर ही गिरनी चाहिए।

  3. कोई अनिवार्य विश्वास मत नहीं: राज्यपालों द्वारा मनमाने ढंग से विश्वास मत का आदेश देने (जिससे अल्पमत सरकारों के जन्म से पहले ही समाप्त होने का जोखिम रहता है) के बजाय, यदि विपक्ष सरकार को चुनौती देना चाहता है तो "अविश्वास प्रस्ताव " लाने का भार उन पर स्थानांतरित होना चाहिए।

निष्कर्ष: राज्यपालों की नियुक्ति राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत होती है और उन्हें केंद्र की राजनीतिक प्राथमिकताओं का नहीं, बल्कि मतदाताओं के चुनावी जनादेश का सम्मान करना चाहिए। एक नई शपथ लेने वाली सरकार को स्वाभाविक रूप से शासन करने और विधायिका का सामना करने की अनुमति दी जानी चाहिए, क्योंकि नए चुनावों का खतरा स्वाभाविक रूप से विधायकों के दल-बदल को रोकता है।

SOURCE:TH