उत्तर:
- मौर्यकाल में भारतीय कला में पहली बार लकड़ी के स्थान पर पाषाण (पत्थर) का व्यापक प्रयोग हुआ। इस काल की कला को दो मुख्य धाराओं में विभाजित किया जा सकता है:
दरबारी (राजकीय) कला
- यह साम्राज्य की प्रशासनिक शक्ति, धार्मिक नीति (धम्म) और वैश्विक संबंधों को दर्शाने के लिए शासकों द्वारा प्रायोजित थी।
- एकाश्मक स्तंभ: चुनार के लाल बलुआ पत्थर से निर्मित जिन पर 'शीशे जैसी चमकदार पॉलिश' थी।
→ उदाहरण: सारनाथ का सिंह शीर्ष (धम्मचक्रप्रवर्तन का प्रतीक), रामपूर्वा का वृषभ शीर्ष (बिहार), लौरिया-नंदनगढ़ स्तंभ और वैशाली का एक-सिंह स्तंभ। - राजप्रासाद व सभा भवन:
→ उदाहरण: पाटलिपुत्र के कुम्रहार से प्राप्त 80-स्तंभों वाला सभा भवन । मेगस्थनीज और फाह्यान ने इसकी तुलना सुसा और एकबताना के ईरानी महलों से की थी। - स्तूप स्थापत्य : ईंटों और गारे से निर्मित।
→ उदाहरण: सांची का महान स्तूप (मध्य प्रदेश) का मूल निर्माण (अशोक कालीन), भरहुत स्तूप तथा बैराट (राजस्थान) का गोल स्तूप। - चट्टान काटकर बनाई गई राजकीय आकृतियाँ:
→ उदाहरण: धौली (ओडिशा) में चट्टान को तराश कर बनाया गया विशाल हाथी (जो बुद्ध के स्वरूप और राजकीय प्रभुत्व को दर्शाता है)।
लोक कला :
- यह आम जनता, स्थानीय कारीगरों और गुप्त/निजी संरक्षकों द्वारा बनाई गई कला थी, जो मुख्य रूप से यक्ष-पूजा, प्रकृति और जन-साधारण के जीवन पर आधारित थी।
- पाषाण निर्मित यक्ष-यक्षिणी मूर्तियाँ: ये विशालकाय, स्वतंत्र रूप से खड़ी मूर्तियाँ हैं जो उर्वरता और लोक-रक्षकों के रूप में पूजी जाती थीं।
→ उदाहरण: दीदारगंज की यक्षी (पटना - चंवर धारिणी), परखम का यक्ष (मथुरा), लोहानीपुर (पटना) से प्राप्त नग्न पुरुष धड़ (जैन तीर्थंकर ) , नटराज ( शिव) की मूर्ति। - आजीविक संप्रदाय के लिए गुफाएँ : अशोक और उनके पौत्र दशरथ द्वारा पहाड़ी गुफाओं को तराश कर भिक्षुओं को दान दिया गया।
→ उदाहरण: बराबर की पहाड़ियों (गया) में स्थित लोमश ऋषि गुफा तथा सुदामा गुफा; नागार्जुनी पहाड़ियों में गोपिका गुफा। - मृण्मूर्तियाँ और मृदभाण्ड :
→ उदाहरण: उत्तरी काले चमकीले मृदभाण्ड जो मौर्य अर्थव्यवस्था के व्यापार का प्रतीक थे (कौशाम्बी और पाटलिपुत्र से प्राप्त), अहिच्छत्र और बुलंदीबाग से प्राप्त मिट्टी की मूर्तियाँ।
निष्कर्ष:
⇒ अतः दरबारी कला जहाँ साम्राज्य की वैचारिक पृष्ठभूमि, तकनीकी श्रेष्ठता और राजकीय शक्ति को उजागर करती है, वहीं लोक कला मौर्यकालीन समाज की जमीनी व धार्मिक विविधता और जनसामान्य की सौंदर्यबोध शैली को प्रस्तुत करती है। इन दोनों का संतुलन ही मौर्य कला को विशिष्ट बनाता है।