उत्तर :
- 19वीं शताब्दी में पाश्चात्य शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मुद्रण संस्कृति तथा भारतीय चिंतकों के प्रयासों से सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों ने भारतीय पुनर्जागरण की वैचारिक आधारशिला रखी।
- पाश्चात्य शिक्षा + भारतीय विचारक → सामाजिक-धार्मिक सुधार → भारतीय पुनर्जागरण → राष्ट्रीय चेतना
भूमिका—
- सामाजिक सुधार: सती (1829), विधवा पुनर्विवाह (1856), महिला शिक्षा एवं जाति-भेद के विरोध से सामाजिक समानता को बल मिला। (राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फुले)
- धार्मिक सुधार: ब्रह्म समाज (1828), आर्य समाज (1875), रामकृष्ण मिशन आदि ने विवेकवाद, धार्मिक सहिष्णुता एवं अंधविश्वास-विरोध को बढ़ावा दिया।
- बौद्धिक जागरण: तर्कशीलता, मानवतावाद एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास हुआ।
- राष्ट्रीय चेतना: आत्मगौरव, सांस्कृतिक पुनर्जागरण एवं राष्ट्रवाद की वैचारिक भूमि तैयार हुई। (स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद)
समालोचनात्मक पक्ष—
- यद्यपि इन आंदोलनों का प्रभाव मुख्यतः शहरी, शिक्षित एवं अभिजात वर्ग तक सीमित रहा, ग्रामीण समाज, जातिगत असमानता तथा आर्थिक विषमता पर इनका प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित था। इनका स्वरूप क्रांतिकारी परिवर्तन की अपेक्षा क्रमिक सुधारवादी अधिक था।
निष्कर्ष:
- “भारतीय पुनर्जागरण ने परंपरा और आधुनिकता के मध्य सेतु का कार्य किया तथा आधुनिक भारत की लोकतांत्रिक, समतामूलक एवं वैज्ञानिक चेतना की नींव रखी।”