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प्रश्न: पारंपरिक भारतीय (धरणी-स्तंभ) और इस्लामिक (मेहराबी) वास्तुकला शैलियों के मध्य प्रमुख संरचनात्मक एवं सजावटी अंतर स्पष्ट कीजिए। (50 शब्द / 5 अंक) (RAS)

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उत्तर:

पारंपरिक भारतीय (धरणी-स्तंभ/Trabeate) बनाम इस्लामिक (मेहराबी/Arcuate) वास्तुकला:

क्र. सं.

तुलना का आधार

पारंपरिक भारतीय शैली (धरणी-स्तंभ / Trabeate)

इस्लामिक शैली (मेहराबी / Arcuate)

1.

प्रवेश द्वार व शीर्ष संरचना

क्षैतिज शहतीर (Lintel) को लंबवत स्तंभों पर रखकर सपाट बीम बनाई जाती थी।

मेहराब (Arch) और केंद्रीय 'की-स्टोन' (Keystone) तकनीक का उपयोग किया जाता था।

2.

छत का स्वरूप

शिखर (रेखीय, फामसाना या पिरामिडाकार) तथा सपाट छतें प्रमुख थीं।

विशालकाय गोल गुंबद (Dome) और अर्ध-गुंबद प्रमुख थे।

3.

ऊर्ध्वाधर तत्व

मीनारों का अभाव था; इनके स्थान पर गोपुरम या मंदिर शिखर ऊँचाई प्रदान करते थे।

कोनों पर चारमीनार या अलग से खड़ी ऊँची मीनारें (Minarets) बनाई जाती थीं।

4.

जोड़ने वाली सामग्री (Mortar)

पत्थरों को बिना किसी गारे के (Dry masonry/Interlocking) खांचों द्वारा जोड़ा जाता था।

पत्थरों व ईंटों को जोड़ने के लिए चूना-गारा (Lime-Mortar) का व्यापक उपयोग किया गया।

5.

सजावटी रूपांकन (Motifs)

मानव, देवी-देवता, जीव-जंतु, यक्ष-यक्षिणी, कलश और पूर्णघट की मूर्तियाँ बनाई जाती थीं।

सजीव आकृतियाँ निषिद्ध थीं; इनके स्थान पर ज्यामितीय आकृतियाँ, अराबेस्क और सुलेख (Calligraphy) प्रयुक्त हुए।

6.

सजावट तकनीक

पत्थर की गहरी नक्काशी (Deep Relief Carving) और मूर्तिकला।

पित्रा-दूरा (Pietra Dura), जालीदार संगमरमर कार्य और प्लास्टर पर नक्काशी।

7.

जल संरचना का उपयोग

परिसर के बाहर या भीतर खुले स्नान कुंड (Pushkarini / बावड़ी) मुख्य रूप से धार्मिक अनुष्ठान हेतु।

चारबाग शैली, कृत्रिम नहरें, फव्वारे और ज्यामितीय हौज (मुख्यतः शीतलता व सौंदर्य हेतु)।

8.

प्रमुख उदाहरण

खजुराहो के मंदिर, कोणार्क का सूर्य मंदिर, बृहदेश्वर मंदिर (तंजावुर)।

कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद, अलाई दरवाजा, ताजमहल, हुमायूँ का मकबरा।

निष्कर्ष: धरणी-स्तंभ (Trabeate) शैली प्राचीन भारतीय वास्तुकला की स्थिरता, मूर्तिकला एवं धार्मिक प्रतीकात्मकता को दर्शाती है, जबकि इस्लामिक मेहराबी (Arcuate) शैली ने विशाल खुली जगहों, भव्य गुंबदों तथा ज्यामितीय सुलेखन को प्राथमिकता दी। आगे चलकर सल्तनत और मुगल काल में इन दोनों शैलियों के समन्वय से 'इंडो-इस्लामिक वास्तुकला' (Indo-Islamic Architecture) का उत्कृष्ट विकास हुआ।