उत्तर:
- मध्यकालीन भारतीय इतिहास में खिलजी वंश, विशेषकर अलाउद्दीन खिलजी का काल (1296-1316 ई.), इंडो-इस्लामिक स्थापत्य कला के परिपक्वता का आरंभिक चरण माना जाता है। इस काल में भारतीय शिल्पकारों और पश्चिमी एशिया (तुर्की/सेल्जुक) से आए कारीगरों के समन्वय से स्थापत्य में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का समावेश हुआ, जिससे नई और सुदृढ़ शैलियों का जन्म हुआ।
- विशुद्ध इस्लामिक शैली एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण: इस काल में पहली बार इमारतों में 'विशुद्ध इस्लामिक शैली' तथा वैज्ञानिक विधि से सच्चे मेहराबों (True Arches) और गुंबदों (Domes) का निर्माण शुरू हुआ। अलाउद्दीन के पुत्र खिज्र खां द्वारा निर्मित जमात खाना मस्जिद इसका उत्कृष्ट प्रमाण है, जिसे भारत में पूर्णतः इस्लामिक शैली में निर्मित प्रथम इमारत माना जाता है।
- सेल्जुक शैली का प्रभाव व नवीन अलंकरण: तुर्की (सेल्जुक) प्रभाव के कारण स्थापत्य में 'कमल की पंखुड़ियों की झालर' (Lotus-bud fringe), 'हॉर्स-शू' (Horse-shoe) मेहराब, ज्यामितीय डिज़ाइन तथा कुरान की आयतों की नक्काशी का सुंदर प्रयोग शुरू हुआ। अलाउद्दीन खिलजी द्वारा 1311 ई. में निर्मित अलाई दरवाजा इसका श्रेष्ठ उदाहरण है, जहाँ इन सेल्जुक विशेषताओं को स्पष्ट देखा जा सकता है।
- लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का प्रयोग: खिलजी काल में पूर्व निर्मित इमारतों के मलबे के बजाय, नए सिरे से खदानों से निकाले गए लाल बलुआ पत्थरों और सफ़ेद संगमरमर का बहुतायत में बेहतरीन सम्मिश्रण किया गया। अलाउद्दीन द्वारा निर्मित अलाई दरवाजा और अधूरी अलाई मीनार में लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का यह आकर्षक प्रयोग स्पष्ट दिखाई देता है।
- उन्नत गारे (Mortar) का प्रयोग और सुदृढ़ता: इस काल के स्थापत्य में जिप्सम और चूने के बेहतरीन व उन्नत गारे का प्रयोग किया गया, जिससे इमारतों की मजबूती और आयु बढ़ी। इसी वैज्ञानिक गारे के कारण इस काल के गुंबद और मेहराब अधिक टिकाऊ और सुडौल बने, जो तत्कालीन निर्माण कला की एक बड़ी उपलब्धि थी।
- सामरिक और भव्य नगरीय स्थापत्य: मंगोल आक्रमणों से सुरक्षा और तत्कालीन आर्थिक संपन्नता के कारण रक्षात्मक किलों व भव्य राजमहलों का निर्माण हुआ। अलाउद्दीन खिलजी द्वारा बसाया गया दिल्ली का दूसरा शहर सीरी (Siri) और उसमें स्थित हजार सितून का महल (सहस्र स्तंभ महल) मजबूत सैन्य किलेबंदी और शाही भव्यता के उत्कृष्ट प्रमाण हैं।
- प्रांतीय विस्तार (राजपूताना में प्रभाव): खिलजी स्थापत्य केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका प्रभाव राजपूताना और अन्य विजित क्षेत्रों में भी दिखाई दिया। राजस्थान के बयाना (भरतपुर) में मुबारक शाह खिलजी द्वारा निर्मित उखा मस्जिद इसका प्रमुख उदाहरण है, जिसमें प्रांतीय और खिलजी शैली का सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है।
- जनोपयोगी और सार्वजनिक निर्माण: इस काल में स्थापत्य का विस्तार केवल धर्म या राजदरबार तक सीमित न रहकर आम जनमानस की सुविधा तक पहुंचा। इसका प्रमुख उदाहरण अलाउद्दीन खिलजी द्वारा सीरी नगर के निवासियों की जल आपूर्ति हेतु निर्मित हौज-ए-अलाई (वर्तमान हौज खास) है।
निष्कर्षतः
⇒खिलजी काल की स्थापत्य कला भारतीय और इस्लामी कला के एक आदर्श और वैज्ञानिक सम्मिश्रण (Indo-Islamic Synthesis) का प्रतीक थी। वैज्ञानिक गुंबद, सच्चे मेहराब, उत्कृष्ट अलंकरण और लाल बलुआ पत्थर व संगमरमर के प्रयोग की जिस समृद्ध परंपरा की शुरुआत इस काल में हुई, उसी ने आगे चलकर तुगलक और मुगल कालीन स्थापत्य की विशालता और भव्यता की ठोस नींव तैयार की। इस काल ने स्थापत्य को एक नई दिशा दी जहाँ मजबूती के साथ-साथ सौंदर्यशास्त्र को भी समान महत्व दिया गया।