Menu

प्रश्न: तुगलक काल में कला, संस्कृति, साहित्य एवं वास्तुकला के क्षेत्र में हुए विकास का विस्तृत वर्णन कीजिए। (RAS)

Read in:

​उत्तर:

  • ​दिल्ली सल्तनत के इतिहास में तुगलक राजवंश का काल न केवल राजनीतिक और प्रशासनिक बदलावों का गवाह रहा, बल्कि कला, संस्कृति, साहित्य और वास्तुकला के क्षेत्र में भी इस काल में नवीन और महत्वपूर्ण विकास हुए। इस युग में अलंकरण (सजावट) से अधिक संरचनात्मक मजबूती पर बल दिया गया, साथ ही भारतीय और इस्लामी (फारसी) संस्कृतियों का एक अनूठा समन्वय देखने को मिला।

​वास्तुकला (Architecture)-

  • ​तुगलक काल की वास्तुकला अपनी सादगी और मजबूती के लिए विख्यात है। 

इसके​ प्रमुख विशेषताएँ: 

  • इस काल में भवनों की सजावट (अलंकरण) के स्थान पर उनकी मजबूती पर अधिक ध्यान दिया गया। दीवारों के निर्माण में 'सलामी' (ढलवां) शैली का प्रयोग हुआ, जो मूलतः रोमन शैली थी; इससे इमारतों को अधिक मजबूती मिलती थी। निर्माण में मुख्यतः धूसर (भूरे) रंग के पत्थरों का उपयोग किया गया।
  • ​गयासुद्दीन तुगलक: इसने दिल्ली के तीसरे नगर 'तुगलकाबाद' का निर्माण करवाया। गयासुद्दीन का मकबरा एक कृत्रिम झील के बीच बनवाया गया, जो लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से निर्मित है। इसके सफेद संगमरमर के गुंबद के शीर्ष पर हिंदू शैली के 'कलश' और 'आमलक' बने हुए हैं।
  • ​मुहम्मद बिन तुगलक: इसके शासनकाल में जहाँपनाह (दिल्ली का चौथा नगर), आदिलाबाद का किला, बेगमपुरी मस्जिद, बारह खंभा और सतपुला का निर्माण हुआ।
  • ​फिरोजशाह तुगलक: इसके काल में इमारतों में ढलवां दीवारों का निर्माण बंद कर दिया गया। इसने फिरोजशाह कोटला (5वाँ नगर), खिड़की मस्जिद, काली मस्जिद, कलां मस्जिद और कुश्क-ए-शिकार बनवाए। इसके काल को 'मस्जिदों का काल' भी कहा जाता है। इसने अशोक के टोपरा और मेरठ स्तंभों को दिल्ली स्थानांतरित करवाया। इसी काल में जूना शाह द्वारा निर्मित 'खान-ए-जहाँ तेलंगानी' का मकबरा भारत का प्रथम अष्टकोणीय मकबरा है।
  • गयासुद्दीन तुगलक-II: इसके समय में कबीरउद्दीन औलिया का मकबरा बना, जिसे 'लाल गुंबद' और 'एकाबवाला मकबरा' भी कहते हैं।

​साहित्य (Literature)


​इस काल में फारसी और क्षेत्रीय भाषाओं का प्रचुर विकास हुआ:

  • ​फिरोजशाह तुगलक ने स्वयं कई ग्रंथों का फारसी में अनुवाद करवाया और अपनी आत्मकथा 'फुतूहात-ए-फिरोजशाही' लिखी।
  • ​शम्स-ए-सिराज अफीफ ने 'तारीख-ए-फिरोजशाही' की रचना की।

​जियाउद्दीन बरनी (जो मुहम्मद बिन तुगलक और फिरोजशाह का दरबारी था) ने दो प्रमुख पुस्तकें लिखीं: 

  1. 'तारीख-ए-फिरोजशाही' (दिल्ली सल्तनत का इतिहास) और 
  2. 'फतवा-ए-जहाँदारी' (शासक वर्ग के लिए नैतिक नीति निर्देश)।

​अमीर खुसरो:

  • उत्तर प्रदेश के पटियाली में जन्मे अमीर खुसरो एक महान लेखक, इतिहासकार, कवि और संगीतकार थे, जिन्होंने दिल्ली के 7 सुल्तानों का काल देखा। इन्होंने 'हिन्दवी' (हिंदी और फारसी का मिश्रण) भाषा का विकास किया।

​खुसरो की प्रमुख रचनाएँ:

  • ​'नूह सिपिहर': इसमें भारत की भौगोलिक सुंदरता का वर्णन है और कश्मीर को धरती का स्वर्ग ("गर फिरदौस बर रु-ए ज़मीं अस्त...") कहा गया है।
  • ​'खजाइन-उल-फुतूह' (तारीख-ए-अलाई): इसमें फारसी साहित्य में जौहर का प्रथम उल्लेख है।
  • ​अन्य ग्रंथ: 'मिफ्ताह-उल-फुतूह', 'किरान-उस-सादैन', 'तुगलकनामा' (तुगलक वंश की जानकारी), 'आशिका' (देवल रानी व खिज्र खान की प्रेम कहानी), और 'एजाज--खुसरवी' (सूफी संतों और धार्मिक जीवन की जानकारी)।

​कला एवं संगीत (Art & Music)


​तुगलक और समकालीन सल्तनत काल में भारतीय और ईरानी संगीत का अद्भुत समन्वय हुआ:

  • अमीर खुसरो ने भारतीय वीणा और ईरानी तंबूरा को मिलाकर 'सितार' का आविष्कार किया। इसके अलावा उन्होंने तबला, कव्वाली, तराना और गजल गायन शैलियों का विकास किया और 'ऐमन' जैसे रागों की खोज की।
    फिरोजशाह तुगलक ने 'राग दर्पण' नामक संगीत ग्रंथ का फारसी अनुवाद करवाया।
  • ​सल्तनत कालीन संगीत के अन्य विकासों में, ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर ने 'ध्रुपद' गायन शैली शुरू की और 'मान कौतूहल' नामक ग्रंथ रचा। जौनपुर के सुल्तान हुसैन शाह शर्की ने 'ख्याल' गायन शैली की खोज की। पीर बोधन जैसे सूफी संतों ने भी संगीत के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

​निष्कर्षतः

  • ​तुगलक काल मध्यकालीन भारतीय इतिहास का एक ऐसा संधिकाल था, जिसने वास्तुकला में कृत्रिम सजावट के बजाय यथार्थवादी मजबूती को अपनाया और साहित्य व संगीत में इंडो-इस्लामिक (गंगा-जमुनी) तहजीब की गहरी नींव रखी। अमीर खुसरो द्वारा हिन्दवी का प्रयोग, वाद्य यंत्रों का आविष्कार और वास्तुकला में अष्टकोणीय मकबरों तथा ढलवां दीवारों का प्रयोग यह सिद्ध करता है कि यह काल कला और संस्कृति के बहुआयामी विकास का एक समृद्ध युग था।