उत्तर:
- वायु प्रदूषण हवा के भौतिक, रासायनिक अथवा जैविक गुणों में होने वाला वह अवांछनीय परिवर्तन है जो मानव स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। WHO के अनुसार, वायु में हानिकारक सूक्ष्म कणों और विषैली गैसों की अत्यधिक सांद्रता श्वसन और हृदय संबंधी गंभीर विकारों का मुख्य कारण है। शीतकाल में विशिष्ट मौसमी परिस्थितियों, स्थलाकृतिक सीमाओं और विभिन्न मानवजनित गतिविधियों के कारण दिल्ली-NCR सहित संपूर्ण उत्तर-पश्चिम भारत गंभीर "गैस चैंबर" जैसी स्थिति में बदल जाता है।
शीतकाल में अत्यधिक वायु प्रदूषण के प्रमुख कारण:
प्राकृतिक एवं मौसमी/भौगोलिक कारक:
- तापमान व्युत्क्रमण (Temperature Inversion): सामान्यतः ऊँचाई के साथ तापमान घटता है, परंतु सर्दियों में ठंडी और भारी हवा ज़मीन की सतह के निकट ठहर जाती है तथा ऊपर गर्म हवा की परत बन जाती है। यह उल्टी स्थिति एक 'वायुमंडलीय ढक्कन' (Atmospheric Lid) की तरह कार्य कर प्रदूषकों के ऊर्ध्वाधर निकास को रोक देती है।
- हवा की धीमी गति व स्थिरता: शीतकाल में सतही हवाएं अत्यंत शांत हो जाती हैं, जिससे प्रदूषक बिखर नहीं पाते।
- स्मॉग निर्माण (Smog): निम्न तापमान, उच्च आर्द्रता और कोहरे के साथ धुआँ मिलकर घने व विषैले स्मॉग (Smoke + Fog) का निर्माण करता है।
- शीतकालीन वर्षा का अभाव: सर्दियों में वर्षा नगण्य होने से मानसूनी वर्षा की तरह 'वेट स्कैवेंजिंग' (हवा की प्राकृतिक धुलाई) नहीं हो पाती, जिससे धूल कण हवा में ही लटके रहते हैं।
- अरावली पर्वतमाला का क्षरण: अरावली पारंपरिक रूप से थार मरुस्थल की रेत के लिए प्राकृतिक अवरोधक थी। अवैध खनन और वनों की कटाई के कारण बने अंतरालों (gaps) से शुष्क रेत व धूल सीधे NCR बेसिन में प्रवेश करती है।
मानवजनित कारक:
- पराली दहन (Stubble Burning): पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धान की कटाई के बाद रबी बुवाई के कम समय के कारण जलाई जाने वाली पराली का धुआँ पश्चिमोत्तरी पवनों के साथ दिल्ली पहुँचता है।
- वाहनीय उत्सर्जन: वाहनों से निकलने वाले बिना जले हाइड्रोकार्बन, NOx,CO तथा अति सूक्ष्म कण।
- औद्योगिक गतिविधियाँ व ताप विद्युत संयंत्र: चिमनियों से उत्सर्जित फ्लाई ऐश और भारी धातुएँ।
- निर्माण कार्य एवं सड़क की धूल: अनियंत्रित निर्माण, तोड़-फोड़ और कच्ची सड़कों से उत्सर्जित PM 10
- घरेलू तापन व आतिशबाजी: ठंड से बचाव हेतु कचरा/बायोमास जलाना और त्योहारी पटाखों का धुआँ।
प्रमुख वायु प्रदूषक:
- कणीय प्रदूषक (PM): PM 2.5 (अत्यंत सूक्ष्म कण जो सीधे रक्तप्रवाह में प्रवेश करते हैं) तथा PM 10 (श्वसनीय धूल कण)।
- गैसीय प्रदूषक: CO, SO2, NO2, NH3, सतही O3, लेड Pb, बेंजीन, आर्सेनिक और निकल।
राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक (NAQI) एवं इसकी श्रेणियाँ:
- MoEFCC द्वारा CPCB एवं IIT कानपुर के सहयोग से 2014 में इसे "एक संख्या - एक रंग - एक विवरण" के सिद्धांत पर 8 प्रदूषकों के आधार पर शुरू किया गया:
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- 0–50 (अच्छा): न्यूनतम प्रभाव
- 51–100 (संतोषजनक): संवेदनशील लोगों को हल्की असुविधा
- 101–200 (मध्यम): फेफड़े/हृदय रोगियों को परेशानी
- 201–300 (खराब): सामान्य लोगों को भी सांस लेने में कठिनाई
- 301–400 (बहुत खराब): लंबे समय तक संपर्क से गंभीर श्वसन विकार
- 401–500 (गंभीर): स्वस्थ व्यक्तियों पर भी घातक असर
AQI का प्रशासनिक व व्यावहारिक महत्व :
- सरल जन-जागरूकता: वैज्ञानिक जटिलता को एक सरल रंग और संख्या में प्रस्तुत कर आम नागरिकों तक सूचना पहुँचाना।
- स्वास्थ्य परामर्श: संवेदनशील समूहों (बच्चों, वृद्धों, दमा रोगियों) को अग्रिम चेतावनी देकर सुरक्षा प्रदान करना।
- नीति निर्माण व GRAP का ट्रिगर: आपातकालीन प्रशासनिक कदमों को स्वतः लागू करने का आधार बनना।
- हॉटस्पॉट की पहचान: प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों (CPCB/SPCB) को विशिष्ट अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों पर लक्षित कार्रवाई करने में सहायता देना।
- प्रशासनिक जवाबदेही: अंतर-शहरी वायु गुणवत्ता की तुलना कर नीतिगत प्राथमिकताओं को तय करना।
नियंत्रण के उपाय एवं प्रभावी समाधान:
तकनीकी समाधान:
- उद्योगों में भारी कणों को रोकने हेतु इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर (ESP) व हल्के कणों हेतु साइक्लोनिक सेपरेटर।
- वाहनों में विषैली गैसों को कम हानिकारक गैसों में बदलने हेतु कैटेलिटिक कनवर्टर।
- निर्माण स्थलों और चौराहों पर एंटी-स्मॉग गन एवं मिस्ट स्प्रेयर का उपयोग।
नीतिगत एवं प्रशासनिक उपाय:
- GRAP (ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान): CAQM द्वारा संचालित 4-चरणीय आपात तंत्र (Stage I: धूल नियंत्रण ,Stage II: डीजल जनरेटर प्रतिबंध ,Stage III: निर्माण कार्य बंद व पुरानी कारों पर रोक ,Stage IV: ट्रकों का प्रवेश बंद व स्कूल/WFH)।
- SAFAR: IITM पुणे द्वारा 24x7 वास्तविक समय निगरानी और 72 घंटे पूर्व का सटीक पूर्वानुमान।
- पराली प्रबंधन: पूसा बायो-डिकम्पोज़र, हैप्पी सीडर मशीनों पर सब्सिडी और बायो-CNG/पेलेट्स जैसे औद्योगिक उपयोग।
- हरित परिवहन: इलेक्ट्रिक वाहनों (FAME नीति) को बढ़ावा और BS-VI मानकों का अनुपालन।
- पारिस्थितिक संरक्षण: अरावली क्षेत्र में अवैध खनन पर पूर्ण रोक और 'अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट' के तहत वनीकरण।
♦ उत्तर-पश्चिम भारत में शीतकालीन प्रदूषण केवल किसी एक राज्य की समस्या न होकर एक साझा 'इंडो-गैंगेटिक एयरशेड' (Indo-Gangetic Airshed) की चुनौती है। इसके स्थायी समाधान हेतु अल्पकालिक आपात उपायों से आगे बढ़कर अंतर-राज्यीय समन्वय, चक्रीय अर्थव्यवस्था आधारित पराली उपयोग और अरावली के पारिस्थितिक संरक्षण जैसे दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधार अनिवार्य हैं।