- स्वीकृति: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 31 जुलाई 2026 को।
- उद्देश्य: गहरे एवं अति-गहरे अपतटीय (ऑफशोर) तेल एवं गैस अन्वेषण को बढ़ावा देना, घरेलू हाइड्रोकार्बन उत्पादन बढ़ाना तथा आयात पर निर्भरता कम करना।
- नोडल मंत्रालय: पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय।
- परिव्यय: ₹84,084 करोड़।
- समयावधि: 2026-27 से 2030-31 तक
- प्रकृति: एक केंद्रीय क्षेत्र योजना।
- इस योजना में चार प्रमुख घटक हैं-
- अपतटीय डेटा संकलन: इसके लिए ₹28,534 करोड़ का परिव्यय रखा गया है। इसमें 2D और 3D भूकंपीय (Seismic) डेटा संकलन एवं अन्य आधुनिक तकनीकें, तथा AI आधारित डेटा री-प्रोसेसिंग एवं राष्ट्रीय डेटा रिपॉजिटरी (NDR) का उपयोग शामिल है।
- अपतटीय अन्वेषण और अवसंरचना-आधारित उत्पादन: इसके लिए ₹43,200 करोड़ का आवंटन किया गया है। इसके तहत 60 गहरे समुद्री अन्वेषण कुओं की खुदाई की जाएगी, जिसमें सरकार द्वारा खुदाई लागत का 50% या प्रति कुआँ ₹675 करोड़ (जो कम हो) तक सहायता दी जाएगी।
- सामान्य अपतटीय अवसंरचना केंद्रों का विकास: ₹10,000 करोड़ के परिव्यय से तेल एवं गैस खोजों के व्यावसायीकरण हेतु साझा अपतटीय अवसंरचना का विकास किया जाएगा।
- तेल एवं गैस विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्रों की स्थापना: ₹2,000 करोड़ का परिव्यय महत्वपूर्ण उपकरणों एवं सेवाओं के घरेलू विनिर्माण (Indigenisation) तथा स्थानीयकरण को बढ़ावा देने के लिए किया जाएगा।
अपेक्षित लाभ
- भारत के ऊर्जा भंडार के 600 मिलियन मीट्रिक टन आयल इक्विवेलेंट (MMTOE) से अधिक बढ़ने की उम्मीद है।
- घरेलू तेल एवं गैस उत्पादन 62 MMTOE से बढ़कर 80 MMTOE प्रति वर्ष होने का अनुमान है।
- हाइड्रोकार्बन संसाधन आधार 1.6 बिलियन TOE से बढ़कर 2.2 बिलियन TOE होने का अनुमान है।
- कच्चे तेल के आयात बिल में लगभग ₹1 लाख करोड़ प्रति वर्ष की संभावित कमी आएगी।
- निजी निवेश को बढ़ावा मिलेगा तथा गहरे समुद्री अन्वेषण में राष्ट्रीय क्षमता का विकास होगा।
- ऊर्जा सुरक्षा एवं आत्मनिर्भरता को मजबूती मिलेगी।
समुद्र मंथन योजना की आवश्यकता
- भारत कच्चे तेल का विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है, जिसका वार्षिक आयात बिल लगभग 144 बिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 13 लाख करोड़ रुपये) है।
- अपतटीय अन्वेषण में उच्च लागत एवं 5-10 वर्ष का लंबा विकास काल लगता है; एक गहरे समुद्री अन्वेषण कुएँ की लागत लगभग 125-150 मिलियन अमेरिकी डॉलर होती है।
- मौजूदा तेल एवं गैस क्षेत्रों में उत्पादन में प्रतिवर्ष 6-7% की प्राकृतिक गिरावट आ रही है।
- बढ़ती ऊर्जा मांग के कारण नए हाइड्रोकार्बन भंडारों की खोज आवश्यक है।
प्रमुख संरचनात्मक सुधार (2014 से)
- अपतटीय क्षेत्रों का विस्तार: 99% से अधिक "नो-गो" क्षेत्रों को खोलकर भारत के 10 लाख वर्ग किमी से अधिक EEZ को पहली बार अन्वेषण हेतु उपलब्ध कराया गया।
- संविदात्मक व्यवस्था का आधुनिकीकरण: उत्पादन-साझाकरण से राजस्व-साझाकरण व्यवस्था अपनाई गई। इससे पारदर्शिता बढ़ी, राजकोषीय व्यवस्था सरल हुई तथा प्रशासनिक हस्तक्षेप कम हुआ।
- विधायी सुधार: तेल क्षेत्र (विनियमन एवं विकास) संशोधन अधिनियम, 2025 द्वारा संविदात्मक स्थिरता, एकीकृत पेट्रोलियम संचालन, बेहतर विवाद समाधान एवं आधुनिक नियामक ढाँचा स्थापित किया गया।
- नए नियमों के माध्यम से कार्यान्वयन: पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस नियम, 2025 लागू कर कार्य में सुगमता, नियामकीय दक्षता तथा पेट्रोलियम पट्टों के प्रबंधन को सरल बनाया गया।
- समान निर्णय व्यवस्था: सभी अनुबंधों के लिए सचिवों की अधिकार प्राप्त समिति का एक समान ढाँचा अपनाया गया, जिससे सभी ऑपरेटरों को समान अवसर मिले।
- अन्वेषण पर विशेष बल: ONGC एवं Oil India के प्रदर्शन मानकों में अन्वेषण गतिविधियों को प्राथमिकता दी गई।
PIB : केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने 84,084 करोड़ रुपये के परिव्यय वाली ‘समुद्र मंथन’ (राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना) को मंजूरी दी