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​प्रश्न: "विजयनगर साम्राज्य का काल दक्षिण भारतीय कला और संस्कृति के विकास का स्वर्णिम युग था।" उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए। (UPSC/RAS)

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​उत्तर:

  • ​14वीं शताब्दी में स्थापित विजयनगर साम्राज्य दक्षिण भारत में एक महान सांस्कृतिक पुनर्जागरण का गवाह बना। इस काल में शासकों के व्यापक संरक्षण ने रचनात्मकता को नई ऊंचाइयां प्रदान कीं। विशेषकर 'आंध्र भोज' और 'यवनराज स्थापनाचार्य' की उपाधि धारण करने वाले कृष्णदेवराय का काल कला, साहित्य और वास्तुकला के चहुंमुखी विकास का गवाह बना, जिसने इसे इतिहास में एक अद्वितीय सांस्कृतिक मील का पत्थर बना दिया।

​स्थापत्य कला (प्रविड़ शैली)-

  • ​विजयनगर में द्रविड़ वास्तुकला से विकसित 'प्रविड़ शैली' का उदय हुआ।
  • ​धार्मिक स्थापत्य: मन्दिरों में ऊंचे विमान, पण्ड्याओं द्वारा आरंभ किए गए भव्य प्रवेश द्वार (गोपुरम), कल्याण मण्डप, अम्मान मण्डप और एकाश्म स्तम्भ (जिन पर 'याली' नामक काल्पनिक पशु की आकृति होती थी) इसकी मुख्य विशेषताएँ थीं।
  • ​प्रमुख मन्दिर: कृष्णदेवराय द्वारा निर्मित 'विट्ठल स्वामी मंदिर' (जिसमें 56 संगीत स्तम्भ हैं) और देवराय-II द्वारा पूर्ण करवाया गया 'हजारा स्वामी मंदिर' इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं। अच्युतदेवराय के समय बना लेपाक्षी मंदिर (आंध्र प्रदेश) अपने 1 इंच हवा में झूलते स्तम्भ और विशाल नंदी के लिए प्रसिद्ध है।
  • ​धर्मनिरपेक्ष स्थापत्य: कमल महल (परिषद् कक्ष), महानवमी डिब्बा, रानी का 'इनडोर स्विमिंग पूल' और माता की स्मृति में बसाया गया 'नागलापुर' शहर इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इस दौरान ब्राह्मणों को धर्मनिरपेक्ष शिक्षा के लिए भी अनुदान दिए गए।

​भाषा एवं साहित्य:

  • ​यह काल संस्कृत, कन्नड़ और विशेषकर तेलुगु भाषा का 'क्लासिक युग' था।
  • ​अष्टदिग्गज: कृष्णदेवराय के दरबार में तेलुगु के 8 महान विद्वान निवास करते थे।
  • ​प्रमुख रचनाएँ: कृष्णदेवराय ने तेलुगु के 5 महाकाव्यों में से एक 'आमुक्तमाल्यद' (जिससे राजनीतिक व वैष्णव सम्प्रदाय की जानकारी मिलती है) तथा संस्कृत में 'जाम्बवती कल्याणम' व 'मदालसा चरित' की रचना की।
  • ​अन्य विद्वान: अल्लसानी पेद्दन (आन्ध्र कविता पितामह) ने 'मनुचरित' व 'हरिकथा सार', तेनाली रामकृष्ण ने 'पाण्डुरंग माहात्म्य', धूर्जटि ने 'कालहस्ति माहात्म्य', नंदी तिम्मन ने 'पारिजात हरण', पिंगली सूरन ने 'राघव पांडवीयम्' व 'गरूड़ पुराण', मादय्यगरी मल्लना ने 'राजशेखर चरित' और रामराजभूषण ने 'वसुचरित' की रचना की। मल्लणार्य ने कन्नड़ में 'वीरशैव चरिामृत' लिखा।

​चित्रकला एवं संगीत कला:

  • ​चित्रकला: लेपाक्षी मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए रामायण, महाभारत, पुराणों के दृश्य, शिव-पार्वती विवाह और विष्णु के 14 अवतारों के चित्र तत्कालीन उत्कृष्ट चित्रकला के प्रमाण हैं।
  • संगीत कला: इस युग में लक्ष्मीनारायण ने 'संगीत सूर्योदय', राम अमात्य ने 'स्वर मेल कलानिधि' और विद्यारण्य ने 'संगीत सार' जैसे महान ग्रंथों की रचना की।

निष्कर्ष:

  • ​यद्यपि 1565 ई. के तालीकोटा (राक्षस तंगड़ी) युद्ध के बाद सदाशिव राय और रामराय के समय इस महान साम्राज्य का पतन हो गया, किन्तु उससे पूर्व यहाँ स्थापत्य की नवीन शैलियों, अष्टदिग्गजों के उत्कृष्ट साहित्य और ललित कलाओं का जो बेजोड़ विकास हुआ, वह निश्चित रूप से इसे दक्षिण भारतीय कला और संस्कृति का 'स्वर्णिम युग' सिद्ध करता है।