उत्तर:
- 'रोजगार विहीन संवृद्धि' (Jobless Growth) वह आर्थिक स्थिति है जिसमें देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में तीव्र वृद्धि दर्ज की जाती है, परंतु उस अनुपात में अर्थव्यवस्था में रोजगार के नए अवसरों का सृजन नहीं हो पाता है।
कारण:
- पूंजी-प्रधान विकास: कृषि से सीधे सेवा क्षेत्र (IT/वित्त) में बदलाव, जहाँ मानव श्रम से अधिक पूंजी व तकनीकी की आवश्यकता होती है।
- विनिर्माण का पिछड़ना: सर्वाधिक रोजगार देने वाले MSME, कपड़ा और विनिर्माण उद्योगों का धीमा विकास।
- तकनीकी स्वचालन: उद्योगों में मशीनीकरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का बढ़ता उपयोग।
- श्रम कानून: जटिल कानूनों से बचने के लिए कंपनियों द्वारा स्थायी नियुक्तियों के बजाय अनुबंध (Contract) मजदूरी को प्राथमिकता देना।
प्रभाव:
- जनसांख्यिकीय आपदा: पर्याप्त रोजगार न मिलने से भारत का बहुमूल्य 'जनसांख्यिकीय लाभांश' (Demographic Dividend) एक गंभीर चुनौती और जनसांख्यिकीय आपदा में बदल सकता है।
- आर्थिक असमानता: विकास का लाभ केवल उच्च-शिक्षित और कुशल वर्ग तक सीमित रहने से समाज में आय की असमानता तेजी से बढ़ रही है।
- सामाजिक अस्थिरता: बेरोजगारी के कारण युवाओं में हताशा बढ़ती है, जिससे अपराध और व्यवस्था के प्रति असंतोष पनपता है।
- कृषि पर दबाव: शहरों में रोजगार न मिलने से कृषि क्षेत्र पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में 'प्रच्छन्न बेरोजगारी' और अधिक विकराल हो जाती है।
निष्कर्ष:
- अतः श्रम-गहन उद्योगों (मेक इन इंडिया) को प्रोत्साहन व बाजार की मांग के अनुरूप युवाओं का कौशल विकास अनिवार्य है। वास्तविक समावेशी विकास की प्राप्ति तभी संभव है जब आर्थिक नीतियां पूर्णतः रोजगार-सृजन पर केंद्रित हों।