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Q.) "क्या मीराबाई केवल भक्त कवयित्री थी या सामाजिक विद्रोह की प्रतीक भी?" कथन का मूल्यांकन कीजिए। (150 words) (RAS)

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उत्तर-

  • मीराबाई मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन की प्रमुख संत-कवयित्री थीं। वे कृष्ण भक्ति के लिए प्रसिद्ध हैं, किंतु उनका व्यक्तित्व केवल आध्यात्मिक नहीं था। उन्होंने तत्कालीन सामाजिक रुढ़ियों, लैंगिक समानता, जातिगत भेदभाव आदि को अपने जीवन और काव्य के माध्यम से चुनौती दी।
मीराबाई

एक भक्त कवयित्री के रूप में सामाजिक विद्रोह की प्रतीक

मीराबाई: एक भक्त कवयित्री के रूप में-

  1. मीराबाई भगवान श्री कृष्ण को अपना पति मानकर "सगुण रूप" में पूजा करती थी।
  2. श्री कृष्ण को अपना सर्वस्व मानकर अनन्य भक्ति का मार्ग अपनाया
    "मेरे तो गिरधर गोपाल, दूजो न कोय।"
    ⇒ इस कारण मीराबाई को 'राजस्थान की राधा' भी कहा जाता है।
  3. मीराबाई के पदों में प्रेम, विरह, समर्पण एवं माधुर्य-भक्ति का सुन्दर चित्रण मिलता है। 
  4. मीराबाई के भक्ति साहित्य (गीत गोविन्द, रुक्मणि मन्गल, नरसी जी रो मायरो) एवं भजनों ने भक्ति आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन दिलाया। 

मीराबाई : सामाजिक विद्रोह की प्रतीक-

  1. पितृसत्तात्म‌क व्यवस्था का विरोध- राजघराने की मर्यादाओं तथा पर्दा प्रथा को चुनौती दी।
  2. स्थानीय भाषा का विकास - सभी रचनाएँ (सत्यभामा नू रुसणो, पदावली आदि) मारवाडी भाषा में लिखकर ।
  3. छुआछूत निवारण - दलित सन्त रैदास को गुरु बनाकर ।
  4. महिला-स्वतंत्रता का संदेश- अपने आध्यात्मिक निर्णय स्वयं लेकर महिलाओं के आत्म सम्मान का उदाहरण प्रस्तुत किया।
  5. जाति व्यवस्था का विरोध- संत परम्परा के अनुकूल जाति-भेदातीत सभी मनुष्यों की समानता पर बल दिया।
  6. रुढिवादिता का प्रतिरोध -  धार्मिक कर्मकाण्ड व बाहय आडम्बरों की अपेक्षा आन्तरिक भक्ति की महत्व दिया। 
  7. नैतिक साहस का उदाहरण - सामाजिक विरोध और पारिवारिक रूढ़िवादी विचारों के बावजूद अपने सिद्धान्तो से समझौता नहीं किया। 

मीराबाई का मूल्यांकन -

  • मीराबाई का उद्देश्य कोई संगठित सामाजिक क्रांति का नहीं, बल्कि ईश्वर भक्ति एवं अध्यात्म की स्थापना था। तथापि उनके जीवन और विचारों ने स्त्री- अधिकार, समानता, सामाजिक स्वतंत्रता की चेतना आदि को प्रेरित किया।

"लोकलाज कुलकान जगत् की, मैं तो प्रेम दीवानी।" 

  • मीराबाई की यह पंक्ति उनके व्यक्तित्व (सामाजिक रूढियों की विरोधी प्रवृत्ति) का सार प्रस्तुत करती है। उन्होंने सामाजिक बन्धनों और रूढ़ियों से ऊपर उठकर व्यक्तिगत आस्था एवं स्वतंत्रता को देने के परिणामस्वरूप उन्हें केवल कृष्ण - भक्त की कवयित्री ही नहीं, अपितु सामाजिक विद्रोह की प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।