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प्रश्न: राजस्थान के प्रागैतिहासिक एवं आद्य-ऐतिहासिक स्थलों का भारतीय इतिहास में क्या महत्व है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए। (150 शब्द) (UPSC/RAS)

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उत्तर:

  • राजस्थान के प्रागैतिहासिक एवं आध-ऐतिहासिक स्थल भारतीय इतिहास की प्रारम्भिक सभ्यताओं, मानव विकास तथा सांस्कृतिक निरंतरता को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। ये स्थल पाषाण युग से लेकर सिंधु-सरस्वती सभ्यता तथा ताम्रपाषाण संस्कृति तक के विकास का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। इनके अध्ययन से भारत में मानव जीवन, कृषि, धातुकर्म, नगरीकरण और व्यापार के क्रमिक विकास की स्पष्ट जानकारी मिलती है।

प्रमुख उदाहरण एवं महत्व—

कालीबंगा (हनुमानगढ़)

  • यह सिंधु-सरस्वती सभ्यता का प्रमुख नगर था। यहाँ से जुते हुए खेत के प्रमाण, अग्निवेदिकाएँ, सुव्यवस्थित नगर योजना, पक्की सड़कें तथा जल निकासी व्यवस्था प्राप्त हुई है। इससे हड़प्पा सभ्यता की कृषि एवं धार्मिक परंपराओं का ज्ञान होता है।

आहड़ (उदयपुर)

  • यह ताम्रपाषाण संस्कृति का प्रमुख केंद्र था। यहाँ ताँबे के औजार, काले-लाल मृद्भांड तथा कृषि के प्रमाण मिले हैं, जो धातुकर्म एवं ग्रामीण जीवन के विकास को दर्शाते हैं।

बालाथल (उदयपुर)

  • यहाँ से विकसित कृषि, पशुपालन, दुर्गनुमा बस्ती तथा मानव कंकाल प्राप्त हुए हैं। कुष्ठ रोग (Leprosy) के प्राचीनतम प्रमाणों में भी इसका विशेष स्थान है।

बागोर (भीलवाड़ा)

  • यह मध्यपाषाण संस्कृति का प्रमुख स्थल है। यहाँ से पशुपालन, शिकार, मछली पकड़ने तथा प्रारम्भिक स्थायी निवास के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।

गिलुंड (राजसमंद)

  • यहाँ से विशाल भंडारगृह, मुद्राएँ तथा व्यापारिक गतिविधियों के प्रमाण मिले हैं, जो राजस्थान के प्राचीन व्यापारिक संबंधों को दर्शाते हैं।

निष्कर्ष:

  • राजस्थान के प्रागैतिहासिक एवं आध-ऐतिहासिक स्थल भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। ये मानव सभ्यता के विकास, कृषि, धातुकर्म, नगरीकरण, व्यापार, सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन तथा सिंधु-सरस्वती सभ्यता के विस्तार को समझने का सशक्त आधार प्रदान करते हैं। इसलिए इन स्थलों का संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक है।