- आसियान (ASEAN) की स्थापना 1967 में हुई थी, जिसका सेक्रेटेरिएट जकार्ता में है। भारत का इसके साथ जुड़ाव लुक ईस्ट पॉलिसी (1991), डायलॉग पार्टनर दर्जा (1996), समिट लेवल पार्टनरशिप (2002) और स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप (2012) के ज़रिए बढ़ा। 2014 में इसे एक्ट ईस्ट पॉलिसी नाम दिया गया और 30 साल पूरे होने पर 2022 में इस रिश्ते को कॉम्प्रेहेंसिव स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप (Comprehensive Strategic Partnership) में बदल दिया गया।
चुनौतियाँ:
- चीन को लेकर अविश्वासः ज्यादातर आसियान देश आर्थिक रूप से चीन पर बहुत निर्भर हैं। इस वजह से साउथ चाइना सी जैसे मुद्दों पर वे भारत का खुलकर साथ नहीं दे पाते। खुद आसियान भी इस विवाद को अब तक नहीं सुलझा पाया है।
- रास्तों और जुड़ाव की कमी: इंडिया-म्यांमार-थाईलैंड ट्राइलेटरल हाईवे और कलादान मल्टीमॉडल ट्रांजिट प्रोजेक्ट जैसी बड़ी परियोजनाओं में लगातार देरी हो रही है, जिससे देशों के बीच जमीनी जुड़ाव कमजोर बना हुआ है।
- व्यापार में नुकसान: आसियान देशों के साथ व्यापार में भारत को लगातार घाटा हो रहा है। भारतीय उद्योगों का मानना है कि आसियान-इंडिया ट्रेड इन गुड्स एग्रीमेंट (ASEAN-India Trade in Goods Agreement - AITIGA) का समझौता भारत के बजाय आसियान देशों के ज्यादा फायदे में है।
- आरसीईपी समझौते से दूरीः भारत रीजनल कॉम्प्रेहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (Regional Comprehensive Economic Partnership - RCEP) समझौते से अलग हो गया। भारत को डर था कि इस समझौते से मुख्य रूप से चीन और अन्य आसियान देशों से सस्ता सामान भारत आने लगेगा, जिससे भारत का व्यापार घाटा और ज़्यादा बढ़ जाएगा।
- पूर्वोत्तर भारत का कम विकासः भारत का नॉर्थईस्ट क्षेत्र आसियान देशों तक पहुँचने का प्राकृतिक रास्ता है। लेकिन यहाँ सड़क और रेल नेटवर्क की कमी और उग्रवाद की समस्या के कारण जमीनी संपर्क धीमा बना हुआ है।
- अलग-अलग सोचः कुछ आसियान देश सोचते हैं कि क्वाड जैसे समूहों में भारत की बढ़ती भूमिका से इलाके की सुरक्षा में आसियान का महत्व कम हो सकता है।
उठाए जा रहे कदमः
- एक्ट ईस्ट पॉलिसी: पुरानी लुक ईस्ट पॉलिसी को बदल कर अब जुड़ाव, व्यापार, संस्कृति, हुनर बढ़ाने और सुरक्षा पर तेज़ी से काम किया जा रहा है।
- जुड़ाव पर दोबारा जोरः ट्राइलेटरल हाईवे का काम तेज़ किया जा रहा है और इसे कंबोडिया, लाओस व वियतनाम तक बढ़ाने का प्रस्ताव है। साथ ही कलादान प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए नया पैसा दिया गया है।
- AITIGA व्यापार समझौते की समीक्षा: जकार्ता में 20वें आसियान-इंडिया समिट के दौरान दोनों पक्ष आसियान-इंडिया ट्रेड इन गुड्स एग्रीमेंट (ASEAN-India Trade in Goods Agreement - AITIGA) की समीक्षा तेज़ी से करने पर सहमत हुए ताकि व्यापार के नुकसान को कम किया जा सके।
- समुद्री सुरक्षा में बराबरी: भारत की सागर विजन और इंडो-पैसिफिक ओशन्स इनिशिएटिव, आसियान आउटलुक ऑन द इंडो-पैसिफिक (ASEAN Outlook on the Indo-Pacific) के साथ मेल खाते हैं, जिससे समुद्र की सुरक्षा में दोनों साथ काम कर रहे हैं।
- सैन्य सहयोग: रक्षा मंत्रियों की नियमित बैठकों और साउथ चाइना सी में हुए आसियान-इंडिया मैरीटाइम एक्सरसाइज से सुरक्षा रिश्ते मजबूत हुए हैं। इसके अलावा भारत सिंगापुर के साथ बोल्ड कुरुक्षेत्र, थाईलैंड के साथ फ्रेंडशिप एक्सरसाइज और बहुपक्षीय मिलन अभ्यास में हिस्सा लेता है।
- डिजिटल और विकास में मददः भारत आसियान देशों को अपना डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (Digital Public Infrastructure), सैटेलाइट तकनीक, क्विक इंपैक्ट प्रोजेक्ट्स और स्कॉलरशिप दे रहा है।
- आर्थिक रिश्तों में मजबूती: 2003 में इंडिया-आसियान बिजनेस काउंसिल बनने के बाद 2009 में सामानों के लिए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (Free Trade Agreement - FTA) और 2014 में सर्विस व निवेश के लिए एफटीए लागू हुआ। इससे दोनों के बीच व्यापार 100 अरब डॉलर तक पहुँच गया है, जिसे अब 200 अरब डॉलर करने का लक्ष्य है।
- शिखर सम्मेलनों के नतीजे: कंबोडिया में 19वें आसियान-इंडिया समिट (2022) में रिश्तों को कॉम्प्रेहेंसिव स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप का दर्जा दिया गया। जकार्ता में 20वें समिट में समुद्री सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा पर दो संयुक्त बयान जारी किए गए। प्रधानमंत्री ने आतंकवाद, साइबर सुरक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, खेती और पर्यटन जैसे क्षेत्रों के लिए 12 सूत्रीय योजना का प्रस्ताव दिया।
निष्कर्ष:
♦ ये कदम दिखाते हैं कि भारत अविश्वास और जुड़ाव की कमी को दूर करने की पूरी कोशिश कर रहा है। लेकिन असली बदलाव तभी दिखेगा जब ये काम समय पर पूरे हों। सबसे ज़रूरी काम हैं पेंडिंग हाईवे और ट्रांजिट प्रोजेक्ट्स को पूरा करना, AITIGA व्यापार समझौते की समीक्षा पूरी करना और पूर्वोत्तर भारत को साउथईस्ट एशिया से जुड़ने का सही जरिया बनाना। सिर्फ पुरानी समस्याओं को ठीक करना ही नहीं, बल्कि आसियान भारत को एक बढ़ता हुआ बाजार, चीन पर निर्भरता घटाने का जरिया और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को सुरक्षित रखने में एक मजबूत साथी भी देता है। इसलिए इन कामों को पूरा करना भारत के अपने हित में है।