प्रश्न: "मुगल चित्रकला केवल दरबारी विलासिता का प्रदर्शन न होकर स्वदेशी भारतीय परंपराओं, फारसी शैली और यूरोपीय तकनीकों का एक अनूठा समन्वय थी।" अकबर एवं जहाँगीर के विशेष संदर्भ में इस कथन की समीक्षा कीजिए। (10 अंक/150 शब्द) (UPSC/RAS)
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उत्तर:
मुगल चित्रकला केवल दरबारी विलासिता तक सीमित न रहकर फारसी, स्वदेशी भारतीय और यूरोपीय कला-शैलियों का एक उत्कृष्ट समन्वय थी।
बाबर ने अपनी आत्मकथा में हेरात के प्रसिद्ध चित्रकार बिहजाद का वर्णन किया, जिसे ‘पूर्व का राफेल’ कहा जाता है।
हुमायूँ फारस (ईरान) से दो प्रमुख चित्रकारों—मीर सैय्यद अली तथा अब्दुस समद (जिन्हें ‘शीरीं कलम’ की उपाधि दी गई)—को भारत लाया।
हुमायूँ के काल में ही फारसी शैली में पांडुलिपि हम्ज़ानामा की शुरुआत हुई, जिसे आगे चलकर अकबर ने पूर्ण कराया।
अकबर का काल (शैलीगत समन्वय व आधारशिला):
अबुल फज़ल के अनुसार अकबर के दरबार में प्रमुख चित्रकार (लगभग 17) कार्यरत थे, जिनमें बड़ी संख्या हिंदू चित्रकारों की थी।
फारसी एवं यूरोपीय समन्वय: फारसी रेखांकन के साथ-साथ यूरोपीय शैली (त्रि-आयामी प्रभाव/3D तकनीक) की शुरुआत हुई।
तकनीकी व रंग संयोजन: भित्ति-चित्रण (Fresco) की शुरुआत हुई, गोल ब्रश का उपयोग किया गया तथा लाल, पीले व नीले रंगों का प्रचुर प्रयोग हुआ।
प्रमुख चित्रकार एवं कृतियाँ:
दसवंत: कहार जाति का प्रतिभाशाली चित्रकार; इसने ‘रज्मनामा’ (महाभारत का फारसी अनुवाद) में मुख्य चित्र बनाए। बाद में मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या कर ली।
बसावन: यह व्यंग्यात्मक व यथार्थपरक चित्रों में निपुण था; इसका प्रसिद्ध चित्र ‘मजनूँ एवं कृशकाय (कमजोर) घोड़ा’ है।
मिश्किन, महेश, लाल, मुकुन्द एवं सावल दास भी इस काल के अन्य महत्वपूर्ण चित्रकार थे।
जहाँगीर का काल (मुगल चित्रकला का स्वर्णकाल):
जहाँगीर स्वयं एक कुशल पारखी व चित्रकार था। उसने अपनी आत्मकथा (तुजुक-ए-जहाँगीरी) में स्वयं को सबसे अच्छा चित्रकार बतलाया तथा आगरा में अकारिज़ा के नेतृत्व में एक नवीन चित्रशाला (वर्कशॉप) स्थापित की। इस काल में अपने सिक्कों पर भी चित्रकारी करवाई गई।
शैलियों का चरमोत्कर्ष: फारसी शैली का प्रभाव लगभग समाप्त होकर यूरोपीय यथार्थवाद तथा भारतीय लघुचित्र शैली का पूर्ण समन्वय स्थापित हुआ।
नवीन विशेषताएँ: पांडुलिपियों के स्थान पर एक ही विषय पर चित्रों का संकलन (एल्बम/मुरक्का), चित्रों के चारों ओर अलंकृत हाशिया छोड़ना तथा शबीह (व्यक्ति-चित्रण) का व्यापक चलन शुरू हुआ।
प्रमुख चित्रकार:
उस्ताद मंसूर: उत्कृष्ट प्राकृतिक व पशु-पक्षी चित्रकार (उपाधि: नादिर-उल-असर), प्रमुख चित्र: ‘बंगाल का अनोखा पुष्प’ और ‘साइबेरिया का सारस’।
अबुल हसन: इसने तुजुक-ए-जहाँगीरी का मुख्य पृष्ठ तथा ‘असंख्य गिलहरियों का चित्र’ बनाया (उपाधि: नादिर-उल-ज़माँ)।
मिश्किन ने यूरोपीय शैली के चित्रों को बढ़ावा दिया; अन्य प्रमुख दरबारी चित्रकारों में फारुख बेग, बिशनदास, दौलत एवं मनोहर शामिल थे।
शाहजहाँ के काल में दैवीय चित्रों का निर्माण हुआ तथा सोने-चाँदी का उपयोग कर रंगों को अत्यधिक चमकीला बनाया गया (फकीरुल्लाह, मीर हाशिम आदि)। औरंगजेब ने स्वयं वीणा बजाने के बावजूद चित्रकला पर प्रतिबंध लगाया, जिससे दरबारी चित्रकारों के पलायन से क्षेत्रीय/प्रांतीय शैलियों का जन्म हुआ।
निष्कर्ष:
अकबर द्वारा रोपित समन्वित दृष्टि और जहाँगीर के कलात्मक संरक्षण ने इसे विश्वस्तरीय संश्लिष्ट कला बना दिया।