Menu

प्रश्न: गुलाम वंश के दौरान इंडो-इस्लामिक वास्तुकला के प्रारम्भिक विकास पर प्रकाश डालिए? (150 शब्द/10 अंक) (RAS)

Read in:

​उत्तर:

  • ​गुलाम वंश के दौरान इंडो-इस्लामिक वास्तुकला का विकास यद्यपि धीमी गति से हुआ, परंतु साम्राज्य के स्थायित्व को दर्शाने के लिए इमारतों की विशालतामजबूती पर विशेष बल दिया गया। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
  1. ​पूर्व-निर्मित वास्तुकला पर निर्माण: आरंभ में तुर्क विजेताओं ने कुशल कारीगरों के अभाव में पूर्व-निर्मित हिंदू-जैन मंदिरों की सामग्री पर ही इमारतें बनाईं। कुतुबुद्दीन ऐबक निर्मित 'कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद' व अजमेर का 'अढ़ाई दिन का झोंपड़ा' इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
  2. ​मस्जिद व विजय मीनारें: इस्लामी सत्ता के प्रतीक के रूप में धार्मिक स्थलों और गगनचुंबी मीनारों की नवीन परंपरा का उदय हुआ, जिसकी परिचायक 'कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद' (सल्तनत काल की प्रथम इस्लामी इमारत) और भव्य 'कुतुब मीनार' हैं।
  3. ​मकबरों की शुरुआत: वास्तुकला के सुव्यवस्थित विकास के तहत भारत में 'मकबरा निर्माण' शुरू हुआ। इल्तुतमिश (मकबरों के जन्मदाता) द्वारा निर्मित 'सुल्तानगढ़ी का मकबरा' मकबरा निर्माण शैली का प्रथम उदाहरण है।
  4. अराबेस्क (Arabesque) अलंकरण: सजावट हेतु ज्यामितीय आकृतियों, फूल-पत्तियों और सुलेखन (कुरान की आयतों) के सम्मिश्रण वाली 'अराबेस्क शैली' का व्यापक प्रयोग 'इल्तुतमिश के मकबरे' और 'कुतुब मीनार' में दृष्टिगोचर होता है।
  5. ​लाल बलुआ पत्थर व सूफी स्मारक: लाल बलुआ पत्थर के उपयोग से एकीकृत शैली विकसित हुई ('इल्तुतमिश का मकबरा', 'गंधक की बावड़ी')। साथ ही, सामाजिक-धार्मिक जुड़ाव के तहत सूफी संतों के सम्मान में नागौर का 'तारकीन का दरवाजा' बनवाया गया।
  6. ​विशुद्ध इस्लामी मेहराब: अंतिम चरण तक आते-आते विशुद्ध इस्लामी तत्वों का पूर्ण समावेश हुआ। सल्तनत काल में पहली बार 'शुद्ध इस्लामी मेहराब' (True Arch) का तकनीकी प्रयोग 'बलबन के मकबरे' और 'लाल महल' में किया गया।