उत्तर:
- गुलाम वंश के दौरान इंडो-इस्लामिक वास्तुकला का विकास यद्यपि धीमी गति से हुआ, परंतु साम्राज्य के स्थायित्व को दर्शाने के लिए इमारतों की विशालता व मजबूती पर विशेष बल दिया गया। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- पूर्व-निर्मित वास्तुकला पर निर्माण: आरंभ में तुर्क विजेताओं ने कुशल कारीगरों के अभाव में पूर्व-निर्मित हिंदू-जैन मंदिरों की सामग्री पर ही इमारतें बनाईं। कुतुबुद्दीन ऐबक निर्मित 'कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद' व अजमेर का 'अढ़ाई दिन का झोंपड़ा' इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
- मस्जिद व विजय मीनारें: इस्लामी सत्ता के प्रतीक के रूप में धार्मिक स्थलों और गगनचुंबी मीनारों की नवीन परंपरा का उदय हुआ, जिसकी परिचायक 'कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद' (सल्तनत काल की प्रथम इस्लामी इमारत) और भव्य 'कुतुब मीनार' हैं।
- मकबरों की शुरुआत: वास्तुकला के सुव्यवस्थित विकास के तहत भारत में 'मकबरा निर्माण' शुरू हुआ। इल्तुतमिश (मकबरों के जन्मदाता) द्वारा निर्मित 'सुल्तानगढ़ी का मकबरा' मकबरा निर्माण शैली का प्रथम उदाहरण है।
- अराबेस्क (Arabesque) अलंकरण: सजावट हेतु ज्यामितीय आकृतियों, फूल-पत्तियों और सुलेखन (कुरान की आयतों) के सम्मिश्रण वाली 'अराबेस्क शैली' का व्यापक प्रयोग 'इल्तुतमिश के मकबरे' और 'कुतुब मीनार' में दृष्टिगोचर होता है।
- लाल बलुआ पत्थर व सूफी स्मारक: लाल बलुआ पत्थर के उपयोग से एकीकृत शैली विकसित हुई ('इल्तुतमिश का मकबरा', 'गंधक की बावड़ी')। साथ ही, सामाजिक-धार्मिक जुड़ाव के तहत सूफी संतों के सम्मान में नागौर का 'तारकीन का दरवाजा' बनवाया गया।
- विशुद्ध इस्लामी मेहराब: अंतिम चरण तक आते-आते विशुद्ध इस्लामी तत्वों का पूर्ण समावेश हुआ। सल्तनत काल में पहली बार 'शुद्ध इस्लामी मेहराब' (True Arch) का तकनीकी प्रयोग 'बलबन के मकबरे' और 'लाल महल' में किया गया।