उत्तर:
- किण्वन प्रौद्योगिकी (Fermentation Technology) सूक्ष्मजीवों (जैसे—बैक्टीरिया, कवक, ईस्ट) की उपापचयी प्रक्रियाओं का उपयोग करके जैविक कच्चे माल को औद्योगिक, औषधीय और खाद्य जैव-उत्पादों में परिवर्तित करने की एक अत्याधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी है।
1. बहु-क्षेत्रीय लाभ (Benefits)
(I) स्वास्थ्य एवं फार्मास्यूटिकल्स: बायो-फार्मास्यूटिकल्स का उत्पादन; जैसे—रिकॉम्बिनेंट इंसुलिन, एंटीबायोटिक्स (पेनिसिलिन) और मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज।
(II) ऊर्जा व सतत विकास: 'राष्ट्रीय जैव-ईंधन नीति' के तहत प्रथम व द्वितीय पीढ़ी (1G/2G) बायो-एथेनॉल और सैटर्ड बायो-सीएनजी (CBG) का निर्माण।
(III) खाद्य एवं जैव-प्रसंस्करण: कार्यात्मक खाद्य पदार्थ (Functional Foods), प्रोबायोटिक्स और खाद्य-संरक्षक (उदा. सिट्रिक एसिड) का बड़े पैमाने पर उत्पादन।
(IV) सर्कुलर बायो-इकोनॉमी: कृषि-अवशेषों (Lignocellulosic Biomass) का पुनर्चक्रण और मूल्यवर्धन।
2. प्रमुख सीमाएं एवं चुनौतियां (Limitations)
(I) तकनीकी जटिलता: बायो-रिएक्टर्स में तापमान, pH और घुलनशील ऑक्सीजन (dO_2) का सटीक डिजिटल नियंत्रण आवश्यक; कंटैमिनेशन (Contamination) का उच्च जोखिम।
(II) डाउनस्ट्रीम प्रोसेसिंग (DSP): किण्वित ब्रोथ (Fermentation Broth) से अंतिम उत्पाद का पृथक्करण और शुद्धिकरण अत्यधिक खर्चीला व जटिल।
(III) पर्यावरणीय जोखिम: डिस्टिलरी अपशिष्ट (Spent Wash) के उच्च BOD/COD मान से जल-प्रदूषण का खतरा।
निष्कर्ष:
♦ उच्च अवसंरचनात्मक लागत और तकनीकी जटिलताओं के बावजूद, किण्वन प्रौद्योगिकी भारत के 'बायो-E3 नीति' (Economy, Environment, Employment) और $300 Billion Bio-economy के लक्ष्य को हासिल करने का मुख्य स्तंभ है।