उत्तर:
भूमिका:
- गणेश्वर सभ्यता राजस्थान के सीकर जिले में कांटली नदी के उद्गम क्षेत्र (नीम का थाना) में स्थित है। आर. सी. अग्रवाल द्वारा किए गए उत्खनन में लगभग 2800 ई.पू. के अवशेष प्राप्त हुए। यहाँ से शुद्ध ताँबे के उपकरणों की अत्यधिक संख्या मिली है, जिसके कारण इसे ‘ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी’ कहा जाता है।
गणेश्वर सभ्यता को ‘ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी’ क्यों कहा जाता है?
- यहाँ से लगभग 99% शुद्ध ताँबे से निर्मित बड़ी संख्या में हथियार एवं उपकरण प्राप्त हुए।
- ताँबे के उपकरणों की इतनी अधिक मात्रा किसी अन्य समकालीन ताम्रयुगीन स्थल से प्राप्त नहीं हुई।
- यह क्षेत्र ताँबे के उत्पादन एवं वितरण का प्रमुख केंद्र था।
- यहाँ निर्मित ताँबे के उपकरण हड़प्पा सभ्यता तक पहुँचाए जाते थे, जिससे इसका व्यापक व्यापारिक महत्त्व सिद्ध होता है।
पुरातात्त्विक महत्त्व
- धातुकर्म का विकास – ताँबे के हथियार, कुल्हाड़ियाँ, भाले, तीरों की नोक आदि उन्नत धातु तकनीक के प्रमाण हैं।
- उन्नत निर्माण तकनीक – बस्ती की सुरक्षा हेतु पत्थरों के बाँध तथा पत्थर के मकानों के अवशेष सुव्यवस्थित निर्माण एवं आपदा प्रबंधन की जानकारी देते हैं।
- व्यापारिक संबंध – हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो से ताँबे के आदान-प्रदान के प्रमाण, विकसित व्यापारिक नेटवर्क को दर्शाते हैं।
- आर्थिक एवं सामाजिक जीवन – मछली पकड़ने के काँटे, तीरों की नोक आदि से शिकार एवं मत्स्य-आधारित जीवन-शैली का पता चलता है।
- कला एवं शिल्प – काले-नीले रंगों से अलंकृत मृद्भांड विकसित कुम्हारकला और सौंदर्यबोध के प्रमाण हैं।
निष्कर्ष:
- गणेश्वर सभ्यता केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की प्रारम्भिक ताम्र तकनीक, व्यापारिक संपर्कों और सांस्कृतिक विकास का महत्वपूर्ण केंद्र थी। इसी कारण इसे ‘ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी’ की संज्ञा दी जाती है।