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प्रसिद्ध पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई का 70 वर्ष की आयु में 5 जुलाई, 2026 को रायपुर में निधन हो गया।
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जन्म: छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गाँव में।
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गुरु: नाना ब्रजलाल से महाभारत की कथाएँ सुनकर प्रेरित हुईं; पहले गुरु उम्मेद सिंह देशमुख थे।
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वैश्विक पहचान: रंगकर्मी हबीब तनवीर के सहयोग से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर ख्याति अर्जित की।
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प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान:
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पद्म श्री (1988)
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संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995)
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पद्म भूषण (2003)
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फुकुओका पुरस्कार, जापान (2018)
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पद्म विभूषण (2019)
पंडवानी लोक कला क्या है?
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अर्थ: 'पंडवानी' शब्द 'पांडव वाणी' का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ है महाभारत में पांडवों की कथाओं का संगीत और नृत्य के साथ गायन।
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गायन की शैलियाँ: पंडवानी की मुख्यतः दो शैलियाँ होती हैं:
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वेदमती शैली: इसमें कलाकार एक स्थान पर बैठकर कथा का गायन करते हैं।
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कापालिक शैली: इसमें कलाकार खड़े होकर, सजीव अभिनय और हाव-भाव के साथ कथा प्रस्तुत करते हैं।
डॉ. तीजन बाई की गायन शैली: इन्होंने 'कापालिक शैली' को अपनाया। प्रस्तुति के दौरान उनके एक हाथ में घुंघरू और मोरपंखों से सजा 'तंबूरा' होता था (जो प्रसंग के अनुसार कभी भीम की गदा तो कभी अर्जुन का गांडीव बन जाता था) और दूसरे हाथ में 'मंजीरा' या 'करताल' होता था।