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भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मंडी के शोधकर्ताओं (प्रो. डेरिक्स पी शुक्ला, अंकित सिंह और नितेश धीमान) ने भारतीय हिमालयी क्षेत्र के लिए एक पूर्णतः कार्यात्मक और वेब-आधारित 'लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग सिस्टम' (भूस्खलन पूर्व-चेतावनी प्रणाली) विकसित किया है।
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प्रमुख विशेषताएं :
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व्यापक कवरेज: भारत में वर्तमान में मौजूद अन्य प्रणालियाँ केवल छोटे या स्थानीय स्तर तक सीमित हैं। इसके विपरीत, IIT मंडी का यह सिस्टम पूरे भारतीय हिमालयी क्षेत्र को कवर करता है, जो इसे देश का सबसे बड़े स्तर पर काम करने वाला पूर्वानुमान सिस्टम बनाता है।
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वास्तविक समय निगरानी: यह मानसून के दौरान प्रतिदिन भूस्खलन का सटीक पूर्वानुमान जारी करता है।
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15 दिन की वर्षा का आकलन: यह सिस्टम नासा (NASA) के उपग्रह और वर्षा डेटा की मदद से पिछले 15 दिन की वर्षा का आकलन करके पल-पल का गतिशील पूर्वानुमान देता है।
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तकनीक और कार्यप्रणाली : यह प्रणाली बेहद आधुनिक और बहु-स्तरीय तकनीक पर आधारित है:
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ऐतिहासिक डेटा का विश्लेषण: भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के डेटाबेस से लगभग 26,000 पुरानी भूस्खलन घटनाओं का विश्लेषण कर एक 'संवेदनशीलता मानचित्र' तैयार किया गया है।
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मशीन लर्निंग का उपयोग: भूस्खलन को ट्रिगर करने वाले कई कारकों को एकीकृत करने के लिए 'एन्सेम्बल मशीन लर्निंग मॉडल्स' का उपयोग किया गया है।
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नासा (NASA) डेटासेट का प्रयोग: नासा के ग्लोबल लैंडस्लाइड कैटलॉग और IMERG सैटेलाइट डेटासेट से प्राप्त 7 वर्षा मापदंडों (Rainfall Parameters) का उपयोग करके 'वर्षा-जनित भूस्खलन संभाव्यता मॉडल' विकसित किया गया है।
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आपदा प्रबंधन में महत्व:
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यह प्रणाली वैज्ञानिक डेटा को तुरंत 'एक्शन लेने योग्य जानकारी' में बदलती है।
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इससे जोखिम वाले इलाकों की पहले से पहचान हो सकेगी, जिससे प्रशासन को लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने (निकासी) और राहत तैयारी करने का पर्याप्त समय मिलेगा।
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यह आपदा जोखिम को कम करने में सबसे असरदार और किफायती निवेश है।