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प्रश्न: भारत में समावेशी और सतत औद्योगीकरण (SDG 9) पर्यावरणीय स्थिरता (SDG 12, 13) को सुनिश्चित करते हुए आर्थिक विकास (SDG 8) को कैसे बढ़ावा दे सकता है? (UPSC/RAS)

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1. भूमिका


  • सतत विकास लक्ष्य (SDGs) आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। भारत जैसी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के लिए, SDG 9 (सतत औद्योगीकरण और नवाचार) एक ऐसे इंजन के रूप में कार्य करता है जो SDG 8 (सभ्य कार्य और आर्थिक विकास) को गति देता है। साथ ही, यह SDG 12 (जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन) तथा SDG 13 (जलवायु कार्रवाई) के तहत भारत के वैश्विक संकल्पों (जैसे- COP-26 में घोषित 2070 तक 'नेट-जीरो' का लक्ष्य) को संतुलित रखते हुए एक 'हरित और समावेशी विकास मॉडल' की नींव रखता है।

2. मुख्य भाग


     (A) आर्थिक विकास (SDG 8) और समावेशिता को बढ़ावा देनाः

  • MSMES और ग्रामीण सशक्तिकरणः भारत की जीडीपी में लगभग 30% और विनिर्माण में 45% योगदान देने वाला MSME क्षेत्र ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को 'सभ्य कार्य' (Decent Work) प्रदान करता है, जिससे विकास का लाभ समाज के निचले तबके तक पहुँचता है।
  • लॉजिस्टिक्स और बुनियादी ढांचाः 'पीएम गतिशक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान' लॉजिस्टिक्स लागत को वर्तमान के~13-14% से घटाकर वैश्विक मानकों (<9%) तक लाने के लिए काम कर रहा है, जिससे उद्योगों की विनिर्माण क्षमता और आर्थिक गति तेज हो रही है।
  • डिजिटलीकरण और वित्तीय समावेशनः 'फिनटेक' और 'डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर' (DPI) ने दूरदराज के क्षेत्रों में वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दिया है, जिससे छोटे उद्यमियों को आसानी से ऋण उपलब्ध हो रहा है।

     (B) पर्यावरणीय स्थिरता (SDG 12 & 13) सुनिश्चित करने की रणनीतियाँ व योजनाएँ:

  • आर्थिक प्रगति को कार्बन उत्सर्जन से अलग (Decoupling) करने के लिए भारत निम्नलिखित पहलों के माध्यम से कार्य कर रहा है:
  • ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition): भारत ने गैर-जीवाश्म ईंधन (Non-fossil fuel) से अपनी स्थापित बिजली क्षमता का 40% से अधिक लक्ष्य समय से पहले हासिल किया है। वर्तमान में भारत का लक्ष्य 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता प्राप्त करना है।
  • राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन: ₹19,744 करोड़ के परिव्यय के साथ यह मिशन स्टील, रिफाइनरी और भारी परिवहन जैसे कठिन क्षेत्रों (Hard-to-abate sectors) को डीकार्बोनाइज कर रहा है।
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy SDG 12): सरकार ने वाहन स्क्रैपेज नीति, प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम (EPR - विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व) और ई-कचरा नियमों के माध्यम से उद्योगों में पुनर्चक्रण को अनिवार्य किया है।
  • ऊर्जा दक्षता (PAT योजना): 'Perform, Achieve and Trade' योजना के जरिए सीमेंट, थर्मल पावर और आयरन जैसे ऊर्जा- गहन उद्योगों ने लाखों टन कार्बन उत्सर्जन (CO2) कम किया है।

3. न्यायिक दृष्टिकोण और संवैधानिक सुरक्षा उपाय


  • भारतीय न्यायपालिका ने हमेशा 'विकास बनाम पर्यावरण' की बहस में "सतत विकास के सिद्धांत" को प्राथमिकता दी है:
  • एम. के. रंजीतसिंह बनाम भारत संघ (Great Indian Bustard Case, 2024):
    इस हालिया मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने जलवायु परिवर्तन के खिलाफ सुरक्षा के अधिकार को अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के तहत एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी है। कोर्ट ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए सौर ऊर्जा बुनियादी ढांचे (SDG 9) और जैव विविधता संरक्षण दोनों के समन्वय पर बल दिया।
  • एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (ताज ट्रेपेजियम केस):
    सर्वोच्च न्यायालय ने उद्योगों के लिए स्वच्छ ईंधन अपनाना अनिवार्य किया और कहा कि आर्थिक लाभ के लिए पर्यावरण और धरोहर से समझौता नहीं किया जा सकता (SDG 12/13)।
  • वेल्लोर सिटिजन्स वेलफेयर फोरम बनाम भारत संघः
    कोर्ट ने 'एहतियाती सिद्धांत' (Precautionary Principle) और 'प्रदूषक भुगतान करे' (Polluter Pays Principle) को भारतीय पर्यावरण कानून का अभिन्न अंग बनाया।

4. विद्यमान चुनौतियाँ

  • हरित वित्तपोषण की कमी (Green Financing Gap): भारत को अपने 2070 के नेट-जीरो लक्ष्यों को पूरा करने के लिए भारी निवेश की आवश्यकता है, जबकि वैश्विक 'क्लाइमेट फंड' से मदद बहुत धीमी है।
  • एमएसएमई का तकनीकी पिछड़ापनः छोटे उद्योगों के पास नई पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को अपनाने के लिए पर्याप्त पूंजी और कौशल की कमी है।
  • कच्चे माल की निर्भरताः इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) और सौर ऊर्जा के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिजों (जैसे लिथियम, कोबाल्ट) के लिए भारत आयात पर निर्भर है।

5. आगे की राह / निष्कर्ष

  • आर्थिक विकास और पर्यावरणीय स्थिरता को एक साथ साधने के लिए भारत को "पर्यावरण के लिए जीवन शैली" (Mission LIFE) के वैश्विक दृष्टिकोण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जिसका आह्वान भारत ने COP-26 में किया था। इसके लिए सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड को बढ़ावा देना और युवाओं को 'हरित रोजगार' (Green Jobs) के लिए तैयार करना आवश्यक है।

 निष्कर्षतः, भारत में समावेशी और सतत औद्योगीकरण केवल एक आर्थिक आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह एक न्यायसंगत और लचीले (Resilient) समाज की रीढ़ है। 'सबका साथ, सबका विकास' के मंत्र के साथ भारत पूरी दुनिया के समक्ष यह साबित कर रहा है कि पारिस्थितिकी (Ecology) की रक्षा करते हुए भी मजबूत अर्थव्यवस्था (Economy) का निर्माण किया जा सकता है।