उत्तरः
- विजयनगर साम्राज्य (14वीं - 16वीं शताब्दी) की वास्तुकला में पल्लव, चोल, पाण्ड्य और होयसल शैलियों के साथ-साथ नवीन विशेषताओं का सम्मिश्रण मिलता है। इसके साथ ही, गैर-मंदिर स्थापत्य में इंडो-इस्लामिक शैली के विकास के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।
1. मंदिर स्थापत्य विकास
- विजयनगर शहर (हम्पी) के साथ-साथ साम्राज्य के अन्य प्रमुख केंद्रों पर विभिन्न भव्य मंदिरों का निर्माण किया गया।
- प्रमुख उदाहरणः
- हजारा स्वामी मंदिर: इसमें रामायण के दृश्यों का सुंदर चित्रण है (देवराय ।। द्वारा निर्मित)।
- विठ्ठल मंदिरः संगीत स्तम्भों के लिए प्रसिद्ध ( कृष्णदेवराय द्वारा निर्मित)।
- विरूपक्ष मंदिरः कृष्णदेवराय द्वारा इसका पुनर्निर्माण और विस्तार कराया गया।
- अच्युत देवराय मंदिर
- लेपाक्षी मंदिरः इसे वीरभद्र मंदिर भी कहा जाता है।
- पंपा देवी मंदिर
- मुख्य विशेषताएँ:
- विशिष्ट स्तम्भः एकाश्मक, संगीतमय व अत्यधिक अलंकृत स्तम्भ, जिन पर 'याली' (शेर और हाथी का मिश्रित स्वरूप) की आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं।
- राया गोपुरमः मंदिरों के प्रवेश द्वार (गोपुरम) पहले की तुलना में अधिक विशाल और अत्यधिक अलंकृत बनाए गए।
- भित्ति चित्रः मंदिरों की दीवारों और छतों पर सुंदर भित्ती चित्रण किया गया (जैसे लेपाक्षी शैली)।
- कल्याण मंडपः दैवीय विवाह उत्सवों के आयोजन के लिए नक्काशीदार और विस्तृत मंडपों का निर्माण।
- अम्मान मंदिरः मुख्य देवता की पत्नी (देवी) के लिए अलग से मंदिर परिसर की स्थापना।
- मूर्ति अलंकरणः मंदिरों में मूर्तियों का गहन अलंकरण (चिदंबरम मंदिर में कृष्णदेवराय की मूर्ति) और ऊभारदार उत्कीर्ण चित्रण।
2. गैर-मंदिर (लौकिक) स्थापत्य विकास
- इस काल में धार्मिक इमारतों के अलावा नागरिक और शाही वास्तुकला का भी अभूतपूर्व विकास हुआ:
- नगर स्थापनाः विजयनगर (हरिहर द्वारा), नागलपुरम् और हॉस्पेट (कृष्णदेवराय द्वारा बसाए गए नगर)।
- राजमहल और राजकीय संरचनाएँ: विजय के महल (जैसे महानवमी डिब्बा और सभा मण्डप)-स्थानीय ग्रेनाइट पत्थरों से विशालकाय मंच निर्माण।
- इंडो-इस्लामिक प्रभावः कमल महल, हाथियों का अस्तबल, जिंजी का झूलता मंडप और मस्जिद ।
- इस्लामिक तत्वों का समावेशः महाप्रवेश द्वारों पर गुम्बद, हाथियों के अस्तबल पर एकांतर क्रम में बने गुम्बद व मण्डप, और नुकीले व अलंकृत मेहराब पूरी तरह से इंडो-इस्लामिक कला को प्रदर्शित करते हैं।