संवैधानिक आधार और पृष्ठभूमि
1. अनुच्छेद 244(2) — असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के आदिवासी क्षेत्रों पर छठी अनुसूची लागू करता है।
2. अनुच्छेद 275(1) — छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों वाले राज्यों को सहायता अनुदान प्रदान करता है।
उत्पत्ति: गोपीनाथ बोरदोलोई (असम के पहले मुख्यमंत्री) की अध्यक्षता वाली बोरदोलोई समिति (1947) की सिफारिशों पर आधारित। इसे पूर्वोत्तर भारत के आदिवासी लोगों के अधिकारों, संस्कृति और रीति-रिवाजों की रक्षा के लिए बनाया गया था।

वायत्त ज़िला परिषदों की शक्तियाँ — 4 आयाम
1. विधायी शक्तियाँ
- इन विषयों पर कानून बना सकती हैं: भूमि का प्रबंधन (आरक्षित वनों को छोड़कर), जलमार्गों और नदियों का उपयोग, झूम खेती (शिफ्टिंग कल्टीवेशन) का विनियमन, गाँव/कस्बे के प्रशासन की स्थापना, आदिवासियों को ऋण देना, सामाजिक रीति-रिवाज। इन कानूनों के प्रभावी होने के लिए राज्यपाल की सहमति आवश्यक है।
2. न्यायिक शक्तियाँ
- आदिवासियों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए ज़िला परिषद न्यायालय और क्षेत्रीय परिषद न्यायालय स्थापित कर सकती हैं (उन मामलों को छोड़कर जिनमें मृत्युदंड, देश-निकाला या 5 वर्ष से अधिक के कारावास का दंड दिया जा सकता हो)। यह गाँव के न्यायालयों के ऊपर अपीलीय न्यायालय के रूप में कार्य करती है। इन न्यायालयों पर उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार होता है।
3. कार्यकारी शक्तियाँ
- ज़िले के भीतर प्राथमिक विद्यालयों, औषधालयों, बाज़ारों, मत्स्य पालन केंद्रों, सड़कों और जलमार्गों का प्रबंधन। यह गैर-आदिवासियों द्वारा ऋण देने और व्यापार करने की गतिविधियों को भी विनियमित कर सकती है। नावों (फेरी) के संचालन की स्थापना और प्रबंधन।
4. वित्तीय शक्तियाँ
- भू-राजस्व का निर्धारण और संग्रह करना; भूमि, भवनों और क्षेत्र में प्रवेश करने वाले माल पर कर लगाना; सड़कों और नावों के संचालन पर पथकर (टोल) लगाना। अनुच्छेद 275(1) के तहत भारत की संचित निधि से सहायता अनुदान प्राप्त करना।
महत्वपूर्ण समितियाँ और आयोग
01. बोरदोलोई समिति (1947) — इसने छठी अनुसूची के ढांचे की सिफारिश की थी; गोपीनाथ बोरदोलोई इसके अध्यक्ष थे और असम के पहले मुख्यमंत्री थे।
02. शिलांग समझौता (1972) — इसके परिणामस्वरूप मेघालय राज्य का गठन हुआ और इसके ADC (खासी, जयंतिया, गारो पहाड़ियाँ) असम से अलग होकर नए राज्य में शामिल हो गए — ये दोनों ही छठी अनुसूची के अंतर्गत आते हैं।
03. दिलीप सिंह भूरिया समिति (2002–04) — इसने पाँचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में PESA-जैसे प्रावधानों के विस्तार की सिफारिश की थी; साथ ही इसने जनजातीय शासन व्यवस्था की भी समीक्षा की थी — जो तुलनात्मक अध्ययन के लिए प्रासंगिक है।
04. बोडो शांति समझौता (2020) — इसने लंबे समय से चली आ रही बोडो उग्रवाद की समस्या का समाधान किया; साथ ही, एक संशोधित छठी अनुसूची ढांचे के अंतर्गत बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद की स्थिति को पुनः पुष्ट किया और उसे और अधिक सशक्त बनाया।
लद्दाख मुद्दा — राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की मांग

मुख्य मांगें — 4 स्तंभ
1. पूर्ण राज्य का दर्जा
- चुनी हुई राज्य विधानसभा की बहाली — ताकि लद्दाखी लोग ज़मीन, रोज़गार, संस्कृति और पर्यावरण पर अपने कानून खुद बना सकें। प्रस्ताव: 'लद्दाख राज्य अधिनियम, 2025' (मसौदा नवंबर 2025 में गृह मंत्रालय को सौंपा गया)।
2. छठी अनुसूची का दर्जा
- छठी अनुसूची में शामिल होना, ताकि विधायी, न्यायिक और वित्तीय शक्तियों वाली 'स्वायत्त ज़िला परिषदें' बनाई जा सकें — जिससे जनजातीय ज़मीन, संस्कृति और रीति-रिवाजों की रक्षा हो सके। प्रस्ताव: 'संविधान (129वां संशोधन) अधिनियम, 2025' (मसौदा)।
3. अलग लोकसभा सीटें
- लेह और कारगिल के लिए अलग-अलग लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों की मांग — अभी दोनों ज़िलों के लिए सिर्फ़ एक ही लोकसभा सीट (लद्दाख निर्वाचन क्षेत्र) है। इसे दो अलग-अलग समुदायों का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व माना जाता है।
4. लोक सेवा आयोग
- राज्य-स्तरीय पदों पर भर्ती के लिए एक अलग 'लद्दाख लोक सेवा आयोग' की मांग — ताकि UPSC या JKPSC पर निर्भर न रहना पड़े, जो लद्दाख की परिस्थितियों का सही प्रतिनिधित्व नहीं करते।
ये मांगें क्यों? — मूल कारण
1. ज़मीन के अधिकारों को लेकर डर: छठी अनुसूची या राज्य विधानसभा के बिना, लद्दाख में बाहरी लोगों द्वारा ज़मीन खरीदने के खिलाफ कोई संवैधानिक सुरक्षा उपाय नहीं हैं। लोगों को जनसांख्यिकीय बदलाव और जनजातीय ज़मीन छिन जाने का डर है — ठीक वैसा ही, जैसा जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 35A रोकता था।
2. रोज़गार को लेकर डर: डर है कि 'अधिवास' (domicile) सुरक्षा के बिना सरकारी नौकरियाँ बाहरी लोगों को मिल जाएँगी। इसकी मांग की गई थी और 'लद्दाख आरक्षण (संशोधन) विनियम, 2025' के तहत इसे कुछ हद तक पूरा भी किया गया है — इसके तहत 15 साल के अधिवास मानदंड वाले स्थानीय निवासियों के लिए 85% आरक्षण तय किया गया है।
3. सांस्कृतिक पहचान: समृद्ध बौद्ध और इस्लामी विरासत; अनोखी भाषाएँ (भोटी, पुर्गी, शिना, बाल्टी) — संवैधानिक सुरक्षा के बिना इनके मिट जाने का डर है। 97% जनजातीय आबादी जनजातीय सुरक्षा उपायों की हकदार है।
4. पर्यावरण की संवेदनशीलता: लद्दाख एक ऊँचाई पर स्थित ठंडा रेगिस्तान है — जिसका पारिस्थितिकी तंत्र बेहद नाज़ुक है। अनियंत्रित विकास और बाहरी लोगों द्वारा की जाने वाली व्यावसायिक गतिविधियाँ यहाँ के ग्लेशियरों, आर्द्रभूमियों और जैव विविधता के लिए खतरा बन रही हैं। छठी अनुसूची लागू होने से स्थानीय लोगों को ज़मीन के उपयोग पर नियंत्रण मिल जाएगा।
5. लोकतांत्रिक कमी: बिना विधायिका वाले एक केंद्र शासित प्रदेश (UT) के तौर पर, लद्दाखी लोगों के पास कानून बनाने के लिए कोई चुनी हुई संस्था नहीं है — सभी फैसले उपराज्यपाल (केंद्र द्वारा नियुक्त) या संसद द्वारा लिए जाते हैं। जम्मू-कश्मीर के अंतर्गत एक चुनी हुई विधानसभा होने के बाद, इसे एक लोकतांत्रिक पिछड़ापन माना जाता है।