उत्तर-
- सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में आर्द्रभूमियाँ जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध प्राकृतिक सुरक्षा कवच के रूप में जलवायु संतुलन, खाद्य सुरक्षा, स्वच्छ जल तथा जैव विविधता संरक्षण के माध्यम से इन लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। जैसे-
| आर्द्रभूमियों की सतत विकास लक्ष्य प्राप्ति में भूमिका |
- सतत विकास लक्ष्य 2 (शून्य भूख)- खाद्य सुरक्षा- धान की खेती आर्द्रभूमि में की जाती है। मछलियाँ अपने जीवन चक्र के एक हिस्से के लिए तटीय आर्द्रभूमियों पर निर्भर रहती हैं।
- उदाहरण- त्रिशूर-पोन्नानी कोले आर्द्रभूमि जहाँ धान की खेती 18वीं शताब्दी से होती आ रही है।
- सतत विकास लक्ष्य 6 (स्वच्छ जल)-
- जल भंडारण- आर्द्रभूमियाँ भूजल के पुनर्भरण में सहायक हैं जिससे उपभोग और सिंचाई के लिए ताज़ा जल उपलब्ध होता है। उदाहरण- युगांडा में नकीवुबो दलदली क्षेत्र।
- भू-दृश्य के गुर्दे- वे अपने तलछट में प्रदूषकों को बंद करके जल से हानिकारक अपशिष्ट को शुद्ध और फ़िल्टर करते हैं और भूजल पुनर्भरण के लिए फ़िल्टर के रूप में कार्य करते हैं।
- सतत विकास लक्ष्य 8 (आर्थिक विकास)- आजीविका का साधन- आर्द्रभूमियाँ कृषि, धान की खेती, वाणिज्यिक मत्स्यन, जलीय कृषि, पर्यटन आदि जैसे क्षेत्रों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं जो श्रम प्रधान हैं।
- उदाहरण- सेंटर फॉर बायोडायवर्सिटी पॉलिसी एंड लॉ (CEBPOL) के अनुसार लगभग 66 करोड़ लोग अपनी आजीविका के लिए आर्द्रभूमि में मत्स्यन और जलीय कृषि पर निर्भर हैं।
- सतत विकास लक्ष्य 10 (असमानताओं में कमी लाना)- आर्द्रभूमियों का समावेशी और सतत विकास जैविक असमानताओं में कमी लाता है।
- सतत विकास लक्ष्य 11 (सतत शहर और समुदाय)- आर्द्रभूमियों से संबंधित सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करना और बढ़ावा देना। जैसे- केवलादेव अभयारण्य, चिल्का झील। आर्द्रभूमियों की शरण में अनेक शहरों का विकास हुआ है।
- सतत विकास लक्ष्य-13 (जलवायु कार्रवाई)- कार्बन सिंक- आर्द्रभूमियाँ क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व की भूमि सतह का केवल 3% भाग घेरते हैं, किंतु कार्बन संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनमें धरातलीय कार्बन का लगभग 30% संग्रहित रहता है, जो विश्व के सभी वनों में संचित कार्बन से लगभग दोगुना है।
- उदाहरण- कांगो बेसिन में विश्व का सबसे बड़ा उष्णकटिबंधीय पीटलैंड।
- सतत विकास लक्ष्य-15 (भूमि पर जीवन)- आर्द्रभूमियों को "जैविक सुपर सिस्टम" कहा जाता है क्योंकि वे बड़ी मात्रा में भोजन का उत्पादन करते हैं एवं उल्लेखनीय स्तर की जैव विविधता का समर्थन करते हैं। समर्थित प्रजातियों की संख्या और विविधता के संदर्भ में, वे वर्षावनों और प्रवाल भित्तियों जितने समृद्ध हैं।
- उदाहरण- दुनिया की लगभग 40% पादपों और जानवरों की प्रजातियाँ आर्द्रभूमि पर निर्भर हैं।
| आर्द्रभूमियों के पुनर्स्थापन हेतु किये गये उपाय |
1. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए उपाय-
- भारत में रामसर सम्मेलन और रामसर स्थल- यह एक अंतर-सरकारी संधि है जो आर्द्रभूमि और उनके संसाधनों के संरक्षण और बुद्धिमानी से उपयोग के लिए रूपरेखा प्रदान करती है, जिसे वर्ष 1971 में अपनाया गया था। भारत वर्ष 1982 में रामसर सम्मेलन का एक पक्षकार बन गया और वर्तमान में भारत में 75 रामसर स्थल हैं जो 13,26,677 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करते हैं।
- वेटलैंड्स इंटरनेशनल- यह एक वैश्विक गैर-लाभकारी संगठन है जो दुनिया भर में आर्द्रभूमि और उनके संसाधनों के संरक्षण एवं बहाली के लिए समर्पित है। यह एक स्वतंत्र, गैर-लाभकारी, वैश्विक संगठन है, जिसे दुनिया भर की सरकारों और गैर-सरकारी संगठनों की सदस्यता द्वारा समर्थित किया जाता है।
2. राष्ट्रीय स्तर पर उपाय-
- वेटलैंड (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के प्रावधानों के तहत अधिसूचित, ये नियम भारत में आर्द्रभूमि के संरक्षण और प्रबंधन के लिए एक नियामक ढाँचा प्रदान करते हैं।
- जलीय पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय योजना- वर्ष 2013 में शुरू की गई, यह देश में आर्द्रभूमि के संरक्षण और प्रबंधन के लिए एक केंद्र प्रायोजित योजना है। इसका उद्देश्य जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र में सुधार के अलावा आर्द्रभूमि का समग्र संरक्षण एवं बहाली करना है।
- आर्द्रभूमि संरक्षण और प्रबंधन केंद्र की स्थापना- यह समर्पित केंद्र आर्द्रभूमि से जुड़ी विशिष्ट शोध आवश्यकताओं और ज्ञान के अंतरालों को पूरा करेगा और आर्द्रभूमि के संरक्षण, प्रबंधन और उनके विवेकपूर्ण उपयोग के लिए एकीकृत दृष्टिकोणों के अनुप्रयोग में सहायता करेगा।
निष्कर्षतः आर्द्रभूमियों का संरक्षण केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व, जलवायु संतुलन, जैव विविधता संरक्षण तथा सतत विकास की अनिवार्य शर्त है। इनके विनाश से पारिस्थितिक असंतुलन, जल संकट, बाढ़, सूखा तथा आजीविका संबंधी समस्याएँ उत्पन्न होंगी। अतः स्थानीय सहभागिता, प्रभावी नीतियों एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से आर्द्रभूमियों का संरक्षण और उनका बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए।