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Q. राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ भारतीय संघीय व्यवस्था में आवश्यकता भी है और विवाद का कारण भी।" इस कथन की संवैधानिक प्रावधानों व न्यायिक दृष्टिकोण के आलोक में समीक्षा कीजिए। (150 शब्द) (UPSC/RAS)

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ANS.

  • भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में राष्ट्रपति की भाँति राज्यपाल को भी स्वविवेकीय शक्तियाँ [अनुच्छेद-163(2) में] प्रदान की गई हैं जिसके अन्तर्गत राज्यपाल कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में बिना राज्य मंत्रिपरिषद की सलाह के स्वतंत्र निर्णय ले सकता है जो राज्य शासन व्यवस्था में विरोधों के बीज बो देने का भी कार्य करती हैं।
राज्यपाल की विवेकाधीन शिक्तयाँ- आवश्यकता एवं विवाद के कारण
प्रावधान [अनु. - 163(2)]

आवश्यकता

विवाद
अनु.-164 (1)- त्रिशंकु सरकार की स्थिति में मुख्यमंत्री नियुक्ति व मंत्रिपरिषद को बर्खास्त करने की शक्ति। → राज्य में राजनीतिक गतिरोध व राजनीतिक अस्थिरता को रोकने हेतु आवश्यक। जैसे- भगत सिंह कोश्यारी (राज्यपाल महाराष्ट्र) ने 2019 में त्रिशंकु विधानसभा के बाद देवेंद्र फड़नवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाकर। अनु.-164 (1) - यह स्पष्ट नहीं करता कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में किसे पहले आमंत्रित किया जाए। जैसे-कर्नाटक राज्यपाल वेजुभाई वाला ने सबसे बड़े दल के नेता B.S. येदियुरप्पा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया, जबकि विपक्ष ने इसका विरोध किया।
अनु.-167- मुख्यमंत्री से विभिन्न विधायी तथा प्रशासनिक सूचनाएं प्राप्त करना। → मुख्यमंत्री व राज्यपाल के संवैधानिक दायित्वों के पालनार्थ।  
अनु.-174- मंत्रिपरिषद, विधानसभा का विघटन / भंग करना। → सरकार के बहुमत खोने, वैकल्पिक सरकार बनने की संभावना न होने जैसे राजनीतिक संकटों से बचाव हेतु। जैसे-बूटा सिंह (राज्यपाल, बिहार) ने 2005 में बिहार विधानसभा भंग की। विधानसभा भंग करने संबंधी राज्यपाल की विवेकाधिकार की सीमा को लेकर विवाद रहता है।
अनु.-200 - विधेयकों को सहमति, असहमति प्रदान करना, पुनर्विचार हेतु भेजना, राष्ट्रपति हेतु आरक्षित रखना। → कानून निर्माण, संघवाद की रक्षा व राष्ट्रीय महत्त्व विषयों की रक्षा हेतु आवश्यक। जैसे- तमिलनाडु राज्यपाल आर. एन. रवि ने विधेयकों पर स्वीकृति रोकी / विलंब किया। संविधान में राज्यपाल के निर्णय के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं है, जिससे विधेयकों को लंबे समय तक लंबित रखा जा सकता है। इससे निर्वाचित राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच टकराव की स्थिति बनती है। जैसे- तमिलनाडु में (2024)
अनु.-356 - राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा करना। → संवैधानिक तंत्र की विफलता से रक्षा करने हेतु ज़रूरी। जैसे- अरुणाचल प्रदेश राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा ने संवैधानिक तंत्र की विफलता पर राष्ट्रपति शासन लगाया।

 

संवैधानिक तंत्र की विफलता की अस्पष्टता (संविधान में स्पष्ट परिभाषा नहीं), राज्यपाल की पक्षपातपूर्ण भूमिका, राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित होने का आरोप लगने से विवादों में रहा है।

अनु.-371 - गुजरात, महाराष्ट्र, असम आदि राज्यों के राज्यपालों को प्राप्त विशेष स्वविवेकाधीन शक्तियाँ। → पिछड़े क्षेत्रों के विकास, जनजातीय संस्कृति की रक्षा और क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका। इस सम्बन्धी विवाद मुख्यतः विशेष प्रावधानों की सीमा तथा अन्य राज्यों द्वारा समान लाभ की मांग को लेकर रहा है।
परिस्थितिजन्य स्वविवेकीय शक्तियां -
1. सत्ताधारी दल को बहुमत परीक्षण हेतु बोलना, 2. बहुमत सिद्ध करने की समय-सीमा का निर्धारण करना, 3. जनहित मामलों की चर्चा हेतु विधानसभा के सत्र बुलाना, CM के विरुद्ध FIR की अनुमति देना। जैसे-बिहार, कर्नाटक।
→ इनके अतिरिक्त संवैधानिक तंत्र की स्थिरता, संघीय व्यवस्था की निरन्तरता, लोकतांत्रिक मूल्यों, बुनियादी ढांचे की रक्षा तथा राज्य के बीच सन्तुलन बनाने हैं। आदि हेतु राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ आवश्यक है। इस प्रकार राज्यपाल की स्वविवेकीय शक्तियाँ भारतीय संघवाद में सबसे अधिक विवादित विषयों में से एक रही
  • सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि ये विवेकाधीन शक्तियाँ असीमित या मनमानी नहीं हैं, बल्कि सीमित और न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं।
  1. एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) - उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुनाया कि अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) के तहत राज्य सरकार की बर्खास्तगी और विधानसभा के विघटन के लिए राज्यपाल की रिपोर्ट की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
  2. नबाम रेबिया बनाम उपाध्यक्ष (2016) - सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल अपने विवेक से अनुच्छेद 174 के तहत विधानसभा का सत्र नहीं बुला सकते, जब तक कि उन्हें मंत्रिपरिषद या मुख्यमंत्री की सलाह न प्राप्त हो।
  3. रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (2006) - इस मामले में, बिहार में विधानसभा चुनाव के बाद सरकार गठन को रोकने और विधानसभा भंग करने की राज्यपाल की सिफारिश को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा असंवैधानिक करार दिया गया। साथ ही कोर्ट ने माना कि राज्यपाल का कार्य वस्तुनिष्ठ होना चाहिए, न कि व्यक्तिगत या राजनीतिक विचारों (आत्मनिष्ठ) से प्रेरित।
  4. तमिलनाडु राज्य बनाम राज्यपाल (2025)- तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि राज्यपाल राज्य विधानमंडल द्वारा विधिवत पारित विधेयकों पर अनिश्चितकाल तक 'पॉकेट वीटो' या पूर्ण वीटो का प्रयोग नहीं कर सकते।
  5. बी.पी. सिंघल बनाम भारत संघ (2010)- इस निर्णय में स्पष्ट किया गया कि यद्यपि राज्यपाल अनुच्छेद 156 के तहत राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा उन्हें केवल मनमाने आधार पर नहीं हटाया जा सकता। राज्यपाल का पद एक स्वतंत्र संवैधानिक प्रहरी (अनुच्छेद- 153-162) का पद है।
  • राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ भारतीय संघवाद में संवैधानिक संतुलन, राजनीतिक स्थिरता और संवैधानिक शासन बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। किंतु इनका प्रयोग दुर्लभ, निष्पक्ष एवं संविधानसम्मत होना चाहिए, न कि राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित होकर। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया हैं कि राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियां न्यायिक समीक्षा के अधीन है और उसका प्रयोग केवल संविधान की भावना के अनुरूप ही किया जाना चाहिए।