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प्रश्न: आधुनिकीकरण एवं वैश्वीकरण के दौर में राजस्थान के त्योहारों एवं मेलों की परंपराओं पर क्या प्रभाव पड़ा है? समझाइए। (RAS)

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उत्तर -

  • अपनी वीर परंपराओं, सांस्कृतिक विविधताओं, मेले-त्योहारों के लिए विश्वप्रसिद्ध राजस्थान न केवल धार्मिक आस्था अपितु सामाजिक एकता, कृषि-चक्र तथा लोक-संस्कृति का भी द्योतक है परन्तु 21 वीं सदी के आधुनिक तकनीकी तथा वैज्ञानिक युग से इन पर्वों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं।

सकारात्मक प्रभावः -


  • सांस्कृतिक विरासत का डिजिटलीकरण:- तीज, गणगौर की सवारियों, गणेश चतुर्थी व विसर्जन की शोभायात्राओं, होलिकोत्सव, दीपोत्सव आदि के वीडियोज ने रील्स, आर्काइव्स, डोक्युमेंटरी आदि के रूप में सांस्कृतिक विरासत का डिजीटलीकरण किया जिसने इन पर्वों को वैश्विक पहचान, युवाओं में रूचि व पर्यटकों की संख्या के साथ राजस्व में संवृद्धि की हैं।
  • पर्यावरण अनुकूल त्योहारः- आधुनिकीकरण ने पर्यावरण प्रदूषण के खिलाफ जागरूकता फैलाई है। जैसे - प्लास्टिक पर प्रतिबन्ध। इससे होली में प्राकृतिक रंगों, दीपावली पर पटाखों का कम प्रचलन, तीज-गणगौर पर मिट्टी की प्रतिमा की तरफ झुकाव बढ़ा है।
  • छुआछूत निवारणः- आधुनिक व वैश्वीकरण ने दलितों, जनजातियों, आदिवासियों आदि के त्योहारों, जैसे- बेणेश्वर मेला, भील जनजाति का अन्नकूट महोत्सव आदि को सामाजिक स्वीकृति प्रदान कर अस्पृश्यता का अंत (Art-17) किया है।
  • सुरक्षा, स्वास्थ्य व प्रबन्धः आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों व मशीनरी (जैसे- CCTV, ड्रोन कैमरा) ने तीज-त्योहारों में भीड़ नियंत्रण एवं स्वास्थ्य सुविधाओं को सुविधाजनक बनाया है। जैसे- रामदेवरा मेला (बाबा री बीज) में भीड़ नियंत्रण।
  • रोजगार व आजीविका के साधनः- यूट्यूबर्स, Vlogs, T.V. सीरियल (बालिका वधू में राजस्थानी संस्कृति) आदि में लोगो को वृत्ति के साधन उपलब्ध करवाए है।
  • लैंगिक समानताः- आधुनिक शिक्षा व सोच ने महिलाधारित त्योहारों (तीज, तीज, गणगौर, राधाष्टमी, मीरा महोत्सव) को प्रधान स्वीकृति दी है।

नकारात्मक प्रभावः-


  • त्योहारों की मूल भावना का पतनः तीज, गणगौर की शोभा यात्राएँ 'फोटोशूट इवेंट' मात्र बन कर रह गयी है।
  • कृत्रिम लोक-संस्कृति का विकासः अक्षय तृतीया पर विवाह समारोह में, गणगौर की सवारियों में, होली पर, संक्रांति के पतंगोत्सव में DJ म्यूजिक के प्रयोग ने कृत्रिम लोक - संस्कृति को बढ़ावा दिया है।
  • सामूहिकता का पतनः- जनमानस के शहरी बसावट (नौकरी शिक्षा, व्यवसाय) के कारण गणगौर व चौथ, एकादशी की सामूहिक कथावाचन, होली पर चंग-गैर की टोलियों का अस्तित्व खतरे में हैं।
  • त्योहारों का संक्षिप्तीकरणः व्यस्त जीवन शैली ने 3 से 5 दिन के त्योहारों का संक्षिप्तीकरण करके 1-2 दिन कर दिया है। जैसे:- धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज का संक्षिप्तीकरण। ये मात्र 1 या 2 दिन के त्योहार रह गए हैं।

रीत बचे तो रंग बचे, बचे लोक पहचान।
संस्कृति बिन सूनौ लागै, उजलो राजस्थान।।

निष्कर्ष:
♦ राजस्थान के त्योहारों में आधुनिक मूल्यों का समावेश करते हुए उनकी पारंपरिक आत्मा, लोक संस्कृति एवं मूल भावना को संरक्षित करने की आवश्यकता है। इसके लिए सरकार निरंतर प्रयासरत है। जैसे - स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रम में शामिल, विभिन्न संस्थागत ढांचे का विकास (देवस्थान विभाग, कला व संस्कृति विभाग) आदि-आदि।