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प्रश्नः भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में क्रांतिकारी आंदोलनों (Revolutionary Movements) के योगदान का मूल्यांकन कीजिए। क्या आपको लगता है कि उनका प्रभाव अहिंसक आंदोलनों के पूरक के रूप में था ? (UPSC/RAS)

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उत्तरः

  • भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी आंदोलन और अहिंसक आंदोलन, यद्यपि विचारधारा में भिन्न थे, परंतु ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में वे एक-दूसरे के पूरक सिद्ध हुए।

क्रांतिकारी आंदोलनों का योगदानः

सकारात्मक पक्षः

  1. जन-चेतना का संचारः क्रांतिकारियों ने जनता के मन से भय को समाप्त किया। अनुशीलन समिति, अभिनव भारत और बाद में एच.एस.आर.ए. (HSRA) जैसे संगठनों ने युवाओं में 'स्वराज्य' की तीव्र आकांक्षा जाग्रत की।
  2. साहस और बलिदान की मिसाल: भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, और सूर्य सेन जैसे नायकों ने अपने प्राणों की आहुति देकर राष्ट्रवाद को एक गौरवशाली और प्रेरणादायक स्वरूप प्रदान किया।
  3. औपनिवेशिक सत्ता की वैधता को चुनौतीः काकोरी कांड और असेंबली बम कांड जैसी घटनाओं ने ब्रिटिश शासन की अजेयता के मिथक को तोड़ा और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को चर्चा का विषय बनाया।
  4. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आवाज उठानाः गदर पार्टी, श्यामजी कृष्ण वर्मा (इंडिया हाउस) मैडम भीकाजी कामा आदि।
  5. वैकल्पिक राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोणः उदा. HSRA की विचारधारा न केवल राजनीतिक स्वतंत्रता अपितु शोषण-मुक्त, समाजवादी भारत की कल्पना ।
  6. असहयोग आंदोलन के बाद की शून्यता को भरना
  7. अभूतपूर्व राष्ट्रवाद और देशभक्ति की भावना।

नकारात्मक पक्षः

  1. दीर्घकालिक रणनीति का अभाव
  2. संगठनात्मक और वित्तीय कमजोरी
  3. ब्रिटिश दमन का बहाना। उदा. रोलेट एक्ट, जन सुरक्षा विधेयक ।
  4. सीमित जनभागीदारी

अहिंसक आंदोलनों के पूरक के रूप में प्रभावः

  • दबाव की रणनीतिः जहाँ अहिंसक आंदोलनों ने व्यापक जन-आधार तैयार किया, वहीं क्रांतिकारी गतिविधियों ने ब्रिटिश सरकार पर निरंतर मानसिक और प्रशासनिक दबाव बनाए रखा, जिससे सरकार को राजनीतिक वार्ता के लिए विवश होना पड़ा।
  • लोकप्रियता में वृद्धिः अक्सर क्रांतिकारियों के व्यक्तिगत बलिदानों ने जनसामान्य में अहिंसक आंदोलनों के प्रति सहानुभूति और समर्थन को और अधिक तीव्र कर दिया।
  • विकल्प की उपस्थितिः गांधीजी के अहिंसक नेतृत्व को अधिक स्वीकार्य बनाने में ब्रिटिश सत्ता के इस डर की भी भूमिका थी कि यदि अहिंसा विफल हुई, तो हिंसात्मक विकल्प मौजूद है। यह डर सरकार को कई बार समझौतावादी रुख अपनाने के लिए प्रेरित करता था।

निष्कर्षः

  • क्रांतिकारी धारा और अहिंसक आंदोलन दो अलग-अलग रास्तों से एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर थे। क्रांतिकारी जहाँ 'तत्काल बलिदान' और 'सीधी कार्रवाई' के प्रतीक थे, वहीं गांधीवादी आंदोलन ने एक विशाल संगठनात्मक ढांचा तैयार किया। अतः, क्रांतिकारी आंदोलनों ने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में 'उत्प्रेरक' (catalyst) की भूमिका निभाई, जिसने अहिंसक आंदोलनों की प्रभावशीलता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।